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Bhubaneswar, भुवनेश्वर : अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर संसद और राज्य विधानसभाओं की समितियों के अध्यक्षों का राष्ट्रीय सम्मेलन शुक्रवार को ओडिशा के भुवनेश्वर में शुरू हुआ । दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया , जिसमें देश भर के समिति प्रमुख अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए नीतियों और कल्याणकारी पहलों को मजबूत करने पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साथ आए हैं।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, बिरला ने संसदीय समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर दिया और कहा कि संसदीय समितियाँ दलगत राजनीति से ऊपर हैं। वे हाशिए पर पड़े वर्गों के हितों की रक्षा करके एक समावेशी भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बिरला ने संसदीय समितियों से पार्टी लाइन से ऊपर उठकर काम करने तथा संविधान में निहित न्याय, समानता और सशक्तिकरण के सिद्धांतों को कायम रखने का आह्वान किया।
संसदीय बहसों के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए बिरला ने कहा कि हम राज्य विधानमंडलों और संसद में चर्चा और संवाद के घटते स्तर को लेकर चिंतित हैं। बिरला ने आगे कहा कि संसद और राज्य विधानमंडल समावेशी भारत के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं, जहां विधायी समितियां जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं, नीतियों की समीक्षा करती हैं और सरकारों को अधिक उत्तरदायी बनाती हैं।
चल रहे सम्मेलन की भूमिका पर, उन्होंने प्रतिनिधियों से सार्थक विचार-विमर्श में भाग लेने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस दो दिवसीय सम्मेलन में, समितियों के अध्यक्षों को आपस में विचार-विमर्श करना चाहिए और समाज के वंचित वर्गों को सामाजिक-आर्थिक और प्रशासनिक मज़बूती प्रदान करने की दिशा में काम करना चाहिए। ऐसा करके, हम उन्हें मुख्यधारा में ला सकते हैं और एक सच्चे समावेशी लोकतंत्र का निर्माण कर सकते हैं। अध्यक्ष ने शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन के महत्व पर भी प्रकाश डाला तथा इस बात पर बल दिया कि समितियों को नवाचार करना चाहिए तथा मूल्यांकन करना चाहिए कि नीतियां हाशिए पर पड़े समुदायों के जीवन पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं।
संवैधानिक दृष्टिकोण पर विचार करते हुए, लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि भारत के संविधान का मूल सिद्धांत समतामूलक समाज का निर्माण करना रहा है। आधुनिक लोकतंत्र के पिछले साढ़े सात दशकों में, भारत ने इस दिशा में व्यापक प्रगति की है। एक सामान्य पृष्ठभूमि का व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन सकता है। यही हमारे लोकतंत्र की मजबूती और सामाजिक न्याय का सच्चा सार है। बिरला ने ओडिशा को "महाप्रभु जगन्नाथ की पवित्र भूमि, आध्यात्मिकता, संस्कृति, कौशल और कड़ी मेहनत का पर्याय" बताया और कहा कि यह सामाजिक न्याय के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को भी मजबूत करता है। इससे पहले, बिरला ने लोक सेवा भवन में एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जिसमें ओडिशा की विधायी यात्रा को दर्शाया गया तथा भारत की संसदीय परंपराओं में राज्य के योगदान पर प्रकाश डाला गया। संसद और राज्य/संघ शासित प्रदेशों के विधानमंडलों की अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण समितियों का राष्ट्रीय सम्मेलन कल संपन्न होगा। इस कार्यक्रम में देश भर से 120 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें संसद और 19 राज्यों की समितियों के अध्यक्ष और सदस्य शामिल थे।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, लोकसभा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष फग्गन सिंह कुलस्ते, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम, ओडिशा विधानसभा के अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी और ओडिशा विधानसभा के उपाध्यक्ष भबानी शंकर भोई ने संबोधित किया। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समितियों के अध्यक्षों का पहला सम्मेलन 1976 में नई दिल्ली में आयोजित किया गया था। इसके बाद 1979, 1983, 1987 और 2001 में सम्मेलन आयोजित किए गए।
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