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भुवनेश्वर: ओडिशा में नाबालिगों की एक बढ़ती संख्या शिक्षा पर ध्यान देने और एक बेहतर भविष्य की तैयारी करने के बजाय, आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो रही है। यह चिंताजनक चलन उनके भविष्य को खतरे में डाल रहा है और कानून लागू करने वाली एजेंसियों, माता-पिता तथा बाल कल्याण समर्थकों के बीच चिंता पैदा कर रहा है।
नशीले पदार्थों के सेवन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को बच्चों में आपराधिक प्रवृत्तियों के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि माता-पिता की ओर से ध्यान न दिया जाना, गलत संगति और हानिकारक ऑनलाइन कंटेंट तक पहुंच भी युवाओं को गैर-कानूनी गतिविधियों की ओर धकेल सकती है। इस समस्या की गंभीरता उपलब्ध आंकड़ों से स्पष्ट होती है। पिछले पांच वर्षों में, ओडिशा में 6,710 नाबालिग आपराधिक मामलों में शामिल पाए गए हैं। और भी चिंताजनक बात यह है कि इस साल के पहले आठ महीनों में ही मामलों की संख्या 1,000 के आंकड़े को पार कर गई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी बताते हैं कि नाबालिग कई तरह के अपराधों में शामिल हैं, जिनमें नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध, हत्या, चोरी, डकैती, हत्या का प्रयास और सामूहिक हमले शामिल हैं।
रिपोर्ट में दिए गए NCRB के आंकड़ों के अनुसार, नाबालिग 2020 में 1,095 मामलों में, 2021 में 1,334 मामलों में और 2022 में 1,163 मामलों में शामिल थे। यह संख्या 2023 में बढ़कर 1,507 और 2024 में 1,611 हो गई। 2024 के दौरान, पुलिस ने 1,835 नाबालिगों को पकड़ा, जिनमें से 1,826 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) के माध्यम से बाल सुधार गृहों में भेजा गया।
कई चिंताजनक घटनाएं
भुवनेश्वर और उसके आसपास सामने आई कई घटनाएं इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं।
शुक्रवार सुबह, बडागडा-बिजेपुर इलाके में मछली पकड़ने को लेकर हुए विवाद के बाद, एक नाबालिग ने कथित तौर पर सात साल के बच्चे की हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि यह विवाद मछली पकड़ने वाली डोरी (फिशिंग लाइन) लगाने को लेकर शुरू हुआ था, जो बाद में एक जानलेवा हमले में बदल गया। आरोप है कि आरोपी ने तौलिए से गला घोंटकर बच्चे की हत्या कर दी। अप्रैल के दूसरे सप्ताह में, लक्ष्मीसागर इलाके में एक गुटीय झड़प के बाद एक नाबालिग और उसके साथियों ने कथित तौर पर बम फेंके, जिससे स्थानीय निवासियों में दहशत फैल गई। मई में, चंद्रशेखरपुर पुलिस थाना क्षेत्र में एक युवक की हत्या के मामले में एक नाबालिग का नाम सामने आया; युवक को एक वाहन से कुचल दिया गया था। बताया जा रहा है कि यह घटना एक 'लव ट्रायंगल' (प्रेम त्रिकोण) से जुड़ी थी। बलियान्ता और नंदनकानन पुलिस थाना क्षेत्रों के अलग-अलग मामलों में, नाबालिग लड़कियों के साथ कथित बलात्कार के आरोप में दो नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया। 29 जून को, खंडगिरि इलाके में दो नाबालिगों ने कथित तौर पर एक पिता और उसके बेटे की हत्या कर दी, जिसके बाद उन्हें पुलिस हिरासत में ले लिया गया। 8 अक्टूबर को देब राय कॉलेज के पास एक और हिंसक घटना हुई, जहां छात्र संघ चुनावों को लेकर दो नाबालिगों के बीच झड़प हो गई, जिसमें वे घायल हो गए। इन घटनाओं ने उन परिस्थितियों को लेकर चिंता बढ़ा दी है जो बच्चों को हिंसा और अन्य गंभीर अपराधों की ओर धकेल रही हैं।
कानूनी सुरक्षा उपाय और पुनर्वास की चुनौती
'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015' (Juvenile Justice Act, 2015) अपराध के आरोपी बच्चों से निपटने के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इसमें बच्चों की देखभाल, सुरक्षा और पुनर्वास को प्राथमिकता दी गई है। इस कानून ने 'किशोर न्याय अधिनियम, 2000' की जगह ली और यह 15 जनवरी 2016 से लागू हुआ। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून के दायरे में आने वाले बच्चों (अपराध के आरोपी बच्चों) को सुधारने और समाज में फिर से शामिल होने का मौका मिले, न कि उनके साथ वयस्क अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाए। 16 से 18 वर्ष की आयु के उन नाबालिगों के लिए विशेष प्रावधान हैं, जिन पर हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने का आरोप है।
उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता, अपराध के परिणामों की उनकी समझ, और जिन परिस्थितियों में अपराध किया गया, उनके प्रारंभिक मूल्यांकन के बाद, 'किशोर न्याय बोर्ड' (Juvenile Justice Board) कुछ मामलों को सुनवाई के लिए 'बाल न्यायालय' (Children’s Court) में स्थानांतरित कर सकता है। हालांकि, इन प्रावधानों के कार्यान्वयन और ओडिशा में मौजूदा किशोर न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता को लेकर चिंताएं जताई गई हैं।
माता-पिता की अनदेखी और ऑनलाइन प्रभाव
बाल संरक्षण कार्यकर्ता बेनुधर सेनापति का मानना है कि माता-पिता की ओर से उचित देखभाल न मिलना उन कारकों में से एक है, जो बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति (juvenile delinquency) को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने देखा कि कुछ माता-पिता अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण, अपने बच्चों को पर्याप्त भावनात्मक सहारा और व्यक्तिगत ध्यान दिए बिना ही बेबीसिटर्स की देखरेख में छोड़ देते हैं। उनके अनुसार, जो बच्चे खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं, वे अपने साथियों के बीच स्वीकार्यता और साथ तलाशने लगते हैं; ऐसे में कभी-कभी वे गलत संगत में पड़ जाते हैं और आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
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