ओडिशा

Puja में अक्षय तृतीया पर घड़ी पथुली पूजा से जुड़ी धार्मिक परंपरा

Ratna Netam
20 April 2026 5:01 PM IST
Puja में अक्षय तृतीया पर घड़ी पथुली पूजा से जुड़ी धार्मिक परंपरा
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Odisha.ओडिशा: आज अक्षय तृतीया के अवसर पर पुरी में एक पुराने और मनोहारी धार्मिक रिवाज “घड़ी पथुली पूजा” का आयोजन किया गया। यह प्राचीन परंपरा सदियों से पुरी के लोगों के बीच जीवित है और इस दिन इसे करने से सौभाग्य, खुशहाली और समृद्धि की कामना की जाती है। घड़ी पथुली पूजा का संबंध मुख्यतः धार्मिक विश्वास और स्थानीय संस्कृति से है। पुरी के मंदिरों और घरों में श्रद्धालु छोटी घड़ियाँ और पथुली (छोटी मिट्टी की मूर्तियाँ) लेकर पूजा करते हैं। यह पूजा इस विश्वास पर आधारित है कि अक्षय तृतीया पर किया गया हर धार्मिक कर्म फलदायी होता है और इस दिन की गई दान, पूजा और आराधना जीवन में स्थायी खुशहाली लाती है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि इस दिन पूजा का क्रम सुबह से ही शुरू होता है। भक्तजन घड़ी और पथुली को साफ-सुथरा करके उन्हें मधुर धूप, पुष्प और मीठे प्रसाद के साथ सजाते हैं। पूजा के दौरान विशेष मंत्र और भजन गाए जाते हैं, जो वातावरण को धार्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं। पुरी प्रशासन ने बताया कि यह परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी खास है। इस रिवाज के जरिए बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। वहीं पर्यटक भी इस अवसर पर पुरी आकर इस अनोखी परंपरा का अनुभव करते हैं और स्थानीय संस्कृति के बारे में जानने का अवसर पाते हैं।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि घड़ी पथुली पूजा के पीछे समय, सततता और स्थायी समृद्धि का प्रतीक छिपा है। घड़ी समय के महत्व का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि पथुली जीवन में स्थायित्व, बचत और धार्मिक भक्ति का संदेश देती है। अक्षय तृतीया पर इनका मिलन दर्शाता है कि जीवन में धन, धर्म और समय का सही संयोजन हमेशा फलदायी होता है। आज पुरी में मंदिरों और घरों में यह रिवाज सुबह से ही पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया गया। लोगों ने अपने परिवार और समुदाय की खुशहाली के लिए पूजा की और दान, सेवा और भंडारे का आयोजन किया। स्थानीय लोग मानते हैं कि इस दिन पूजा करने से संपत्ति, स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि होती है। अक्षय तृतीया पर पुरी में घड़ी पथुली पूजा यह संदेश देती है कि परंपराएं और धार्मिक रिवाज न केवल हमारी संस्कृति को जीवित रखते हैं, बल्कि समाज में सामूहिक भावना और खुशहाली भी फैलाते हैं।
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