ओडिशा

Odisha में अक्षय तृतीया पर पारंपरिक पूजा और धार्मिक अनुष्ठान

Ratna Netam
20 April 2026 4:54 PM IST
Odisha में अक्षय तृतीया पर पारंपरिक पूजा और धार्मिक अनुष्ठान
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Bhubaneswar.भुवनेश्वर: आज पूरे देश में अक्षय तृतीया का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है, और ओडिशा राज्य में इसे विशेष रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के साथ मनाया जाता है। अक्षय तृतीया का अर्थ होता है “जिस दिन शुरू किया गया कार्य कभी नष्ट नहीं होता”। इस दिन किये गए कार्य, दान और निवेश को सदैव फलदायी माना जाता है।
ओडिशा में अक्षय तृतीया को धार्मिक और पारंपरिक अनुष्ठानों के माध्यम से मनाने की परंपरा है। इस दिन लोग धन, कृषि उपकरण, सोना-चांदी और नए व्यवसाय खरीदने का शुभ समय मानते हैं। धार्मिक स्थल और मंदिर इस अवसर पर सजाए जाते हैं, और भक्तजन भगवान विष्णु, भगवान श्रीकृष्ण और मां लक्ष्मी की विशेष पूजा करते हैं।
इस दिन कई किंवदंतियाँ और पौराणिक कथाएँ जुड़ी हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन कौरवों से युद्ध करने के लिए अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, और भगवान वैष्णव इस दिन अपनी कृपा देते हैं। ओडिशा में, खासकर पुरी जगन्नाथ मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजा और भंडारा आयोजित किया जाता है। श्रद्धालु दान और सेवा करने में विश्वास रखते हैं क्योंकि इसे अत्यंत पवित्र और फलदायी दिन माना जाता है।
त्योहार की विशेष परंपराएँ भी ओडिशा में निभाई जाती हैं। लोग नए व्यावसायिक वर्ष की शुरुआत इसी दिन करते हैं और नए खाते, बैंकों में निवेश और सोना-चांदी खरीदते हैं। कृषक इस दिन बीज बोने और नए उपकरण खरीदने का शुभ अवसर मानते हैं। बच्चों और युवाओं के लिए भी यह दिन विशेष होता है क्योंकि उन्हें धार्मिक कथाएँ सुनाई जाती हैं और नैतिक शिक्षा दी जाती है।
अक्षय तृतीया का सामाजिक महत्व भी कम नहीं है। लोग इस दिन जरूरतमंदों को दान देते हैं और गरीबों के लिए भोजन और वस्त्र उपलब्ध कराते हैं। मंदिरों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से भंडारे और स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी आम है। ओडिशा में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।
इस प्रकार, अक्षय तृतीया न केवल धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी जोड़ने वाला उत्सव है। ओडिशा में इस दिन की परंपराएँ सदियों पुरानी हैं और इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा गया है।
आज के दिन, राज्यभर में लोग सुबह से ही मंदिरों की ओर रुख करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और सामाजिक कार्यों में भाग लेते हैं, ताकि उनका जीवन खुशहाल, समृद्ध और पवित्र बना रहे।
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