
Karnataka कर्नाटक: वर्ष 2023 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज मामलों को लेकर सामने आए एक अध्ययन में कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून के तहत दर्ज मामलों में लगभग 22 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को अदालत से बरी कर दिया गया।
तुमकुरु, चिक्कमगलुरु और रायचूर जिलों में किए गए सर्वे में यह भी पाया गया कि ऐसे मामलों में केवल 0.2 प्रतिशत मामलों में ही अपील दायर की गई, जो न्याय प्रक्रिया में गंभीर कमी को दर्शाता है। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2016 से अब तक बरी हुए मामलों में अपील दायर करने की दर 20 प्रतिशत से भी कम रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्थिति न केवल जांच और अभियोजन प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि 2023 में करीब 20 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट निर्धारित 60 दिनों की समय सीमा के बाद दाखिल की गई, जबकि कानून के अनुसार एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत मिलने के 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करना अनिवार्य है। समय पर चार्जशीट दाखिल न होने से मामलों की सुनवाई और निपटारे में देरी हो रही है।इसके अलावा, कोर्ट में
लंबित मामलों के निपटारे की दर भी अपेक्षाकृत कम पाई गई है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।
इन निष्कर्षों के आधार पर अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि शेड्यूल्ड कास्ट्स एंड शेड्यूल्ड ट्राइब्स (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) रूल्स, 1995 के नियम 4(2) के अनुसार हर साल जनवरी और जुलाई में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर्स के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए।
साथ ही यह भी सुझाव दिया गया है कि नियम 4(4) के तहत जिला मजिस्ट्रेट और जिला स्तर पर प्रॉसिक्यूशन के प्रभारी अधिकारियों द्वारा मामलों की मासिक समीक्षा की जाए, ताकि जांच और अभियोजन प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सुझावों को लागू किया जाए तो मामलों की जांच में तेजी आएगी, समय पर चार्जशीट दाखिल होगी और पीड़ितों को न्याय मिलने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकेगी।
यह रिपोर्ट न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है और यह भी बताती है कि कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक स्तर पर अधिक जवाबदेही जरूरी है।





