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अटलांटिक में चार मीटर ऊंची लहरों के बीच पुणे के कैप्टन ने बचाई चार जिंदगियां

पुणे। अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच जब चार मीटर तक ऊंची लहरें उठ रही थीं और एक जहाज बिना पावर के समुद्र में बेबस होकर बह रहा था, उस समय पुणे के 58 वर्षीय मास्टर मैरिनर कैप्टन राज श्रीवास्तव के सामने केवल एक लक्ष्य था—मुसीबत में फंसे लोगों को सुरक्षित बचाना। कठिन मौसम और समुद्र की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच चलाया गया यह बचाव अभियान उनके तीन दशक से अधिक लंबे समुद्री करियर के सबसे यादगार रेस्क्यू अभियानों में शामिल हो गया।
पुणे के निर्मल टाउनशिप निवासी कैप्टन श्रीवास्तव उस समय MV अरुणा इस्माइल की कमान संभाल रहे थे। इसी दौरान उन्हें मैरीटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर (MRCC) से समुद्र में एक जहाज के संकट में फंसे होने की सूचना मिली। सूचना मिलते ही उन्होंने स्थिति को समझते हुए बचाव अभियान की तैयारी शुरू की।
बिना पावर के समुद्र में बह रहा था जहाज
जिस जहाज को मदद की जरूरत थी, वह समुद्र के बीचों-बीच बिना पावर के बह रहा था। तेज हवाओं और ऊंची लहरों के बीच जहाज पर सवार लोगों के लिए स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही थी। जहाज पर तीन लोग सवार थे। इनमें कनाडा के नागरिक ड्वेन थेरियाल्ट तथा अमेरिका के नागरिक जॉनी एंजेलिको ऑडेन एलन और राउल डेविड ऑडेन एलन शामिल थे। उनके साथ उनका पिटबुल कुत्ता ‘किरा’ भी था।
समुद्र में किसी जहाज का पावर खो देना सामान्य स्थिति नहीं होती, खासकर तब जब मौसम खराब हो और लहरों की ऊंचाई कई मीटर तक पहुंच रही हो। ऐसी परिस्थिति में जहाज की दिशा और स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा समुद्र में मदद पहुंचाने के लिए दूसरे जहाज को भी मौसम और समुद्री परिस्थितियों के बीच सावधानी से आगे बढ़ना पड़ता है।
MRCC से मिली सूचना के बाद शुरू हुआ अभियान
कैप्टन श्रीवास्तव को जैसे ही संकटग्रस्त जहाज की जानकारी मिली, उन्होंने बचाव अभियान को प्राथमिकता दी। उनके लिए यह सिर्फ एक समुद्री ऑपरेशन नहीं था, बल्कि उन लोगों की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी थी जो खुले समुद्र में मदद का इंतजार कर रहे थे।
उन्होंने परिस्थितियों का आकलन करते हुए अपनी टीम के साथ अभियान की तैयारी की। चार मीटर तक ऊंची लहरों के बीच किसी दूसरे जहाज तक पहुंचना और वहां मौजूद लोगों को सुरक्षित निकालना चुनौतीपूर्ण काम था। ऐसे अभियानों में चालक दल की सतर्कता, अनुभव और आपसी समन्वय बेहद महत्वपूर्ण होता है।
कैप्टन श्रीवास्तव के तीन दशक से अधिक लंबे समुद्री अनुभव ने इस दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समुद्र की बदलती परिस्थितियों को समझना और चुनौतीपूर्ण हालात में सही निर्णय लेना उनके अनुभव का हिस्सा रहा है।
तीन लोगों के साथ कुत्ता भी था सवार
संकट में फंसे जहाज पर तीन लोगों के अलावा उनका पालतू पिटबुल कुत्ता ‘किरा’ भी मौजूद था। बचाव अभियान को लेकर यह पहलू भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि संकट में फंसे लोगों के साथ उनके पालतू जानवर की सुरक्षा भी जुड़ी हुई थी।
समुद्र के बीच संकट की स्थिति में फंसे लोगों के लिए हर गुजरता पल मुश्किल हो सकता है। ऐसे में उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना बचाव दल की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। कैप्टन श्रीवास्तव और उनके चालक दल ने इसी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए अभियान को आगे बढ़ाया।
11 जुलाई का अभियान बना यादगार
11 जुलाई को हुआ यह रेस्क्यू ऑपरेशन कैप्टन श्रीवास्तव के समुद्री करियर की यादगार घटनाओं में शामिल हो गया। 58 वर्ष की उम्र में भी समुद्र में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने जिस तरह बचाव अभियान का नेतृत्व किया, वह उनके अनुभव और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है।
तीन दशक से अधिक समय समुद्र में बिताने के बाद भी इस तरह का अभियान उनके लिए खास रहा। खुले समुद्र में मौसम की चुनौती, ऊंची लहरें और संकट में फंसे जहाज तक पहुंचने की जिम्मेदारी ने पूरे ऑपरेशन को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया था।
पुणे के कैप्टन की समुद्री दुनिया में मिसाल
कैप्टन श्रीवास्तव मूल रूप से पुणे से हैं और निर्मल टाउनशिप में रहते हैं। समुद्री क्षेत्र में लंबे करियर के बावजूद उनका यह अनुभव उनके शहर से भी जुड़ी एक प्रेरक कहानी बन गया है। समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों के लिए यह घटना भले ही दूर की लगे, लेकिन समुद्री परिवहन में काम करने वाले लोगों के लिए ऐसे बचाव अभियान पेशे की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल होते हैं।
किसी संकटग्रस्त जहाज तक पहुंचना केवल तकनीकी कौशल का मामला नहीं होता। इसमें निर्णय लेने की क्षमता, धैर्य, टीमवर्क और मानवीय संवेदनशीलता भी जरूरी होती है। कैप्टन श्रीवास्तव के मामले में भी यही भावना दिखाई दी।
‘हमें उन्हें बचाना है’ बना अभियान का आधार
अटलांटिक की ऊंची लहरों और संकटपूर्ण परिस्थितियों के बीच कैप्टन श्रीवास्तव के मन में एक ही विचार था—“हमें उन्हें बचाना है।” यही भावना पूरे अभियान की दिशा बनी।
समुद्र में होने वाले बचाव अभियानों में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। किसी जहाज के लंबे समय तक बिना पावर के समुद्र में बहने से स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में संकट की सूचना मिलने के बाद तेजी से निर्णय लेना और बचाव दल को सक्रिय करना बेहद जरूरी होता है।
कैप्टन श्रीवास्तव का यह अभियान बताता है कि समुद्र में काम करने वाले नाविकों की जिम्मेदारी केवल जहाज और माल की सुरक्षा तक सीमित नहीं होती। जरूरत पड़ने पर उन्हें दूसरे जहाजों और उन पर मौजूद लोगों की जिंदगी बचाने के लिए भी आगे आना पड़ता है।
11 जुलाई का यह अभियान उनके लंबे समुद्री सफर की उन घटनाओं में शामिल हो गया, जिन्हें वह लंबे समय तक याद रखेंगे। अटलांटिक महासागर की ऊंची लहरों के बीच संकट में फंसे लोगों तक पहुंचना और उन्हें सुरक्षित निकालने की कोशिश ने एक बार फिर साबित किया कि समुद्र में अनुभव, साहस और इंसानी जज्बे की कितनी बड़ी भूमिका होती है।





