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‘ऑपरेशन टाइगर’ शिवसेना की मजबूती का प्रतीक है: Deepak Kesarkar

Maharashtra महाराष्ट्र: शिवसेना विधायक दीपक केसरकर ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत के दौरान ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर चल रही चर्चाओं पर स्पष्टता दी। उन्होंने कहा कि डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के गुट की ओर से चलाए जा रहे इस अभियान का नाम ‘ऑपरेशन टाइगर’ इसलिए रखा गया है क्योंकि टाइगर शिवसेना का प्रतीक है और यह पार्टी की बढ़ती ताकत को दर्शाता है।
इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में एक बार फिर शिवसेना के अंदरूनी समीकरणों और संगठनात्मक रणनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। केसरकर ने कहा कि यह नाम किसी राजनीतिक संदेश से ज्यादा शिवसेना की पहचान और उसके लगातार मजबूत होते आधार को दर्शाता है।
उन्होंने एक वीडियो के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट की, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किया गया है। वीडियो में वे मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहते नजर आए कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम इसलिए चुना गया है क्योंकि टाइगर शिवसेना का चुनाव चिन्ह और उसकी विचारधारा का प्रतीक है।
#WATCH | Mumbai, Maharashtra: On Operation Tiger, Shiv Sena MLA Deepak Vasant Kesarkar says, "Why is it called Operation Tiger? Because the tiger is the symbol of Shiv Sena, and Shiv Sena is getting stronger day by day. A number of people want to join, and a number of… pic.twitter.com/tRT7t1XOBS
— ANI (@ANI) June 16, 2026
केसरकर ने कहा कि शिवसेना दिन-ब-दिन मजबूत हो रही है और पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और अधिक सुदृढ़ हो रहा है। उनके अनुसार, यह अभियान पार्टी के विस्तार और जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि शिवसेना का यह स्वरूप जनता के बीच अपनी उपस्थिति और प्रभाव को और अधिक बढ़ा रहा है। हालांकि, उन्होंने किसी भी तरह के राजनीतिक विवाद या अंदरूनी मतभेद पर सीधा टिप्पणी करने से परहेज किया।
‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जहां शिंदे गुट इसे संगठनात्मक मजबूती और विस्तार की रणनीति बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया के रूप में देख रहा है।
शिवसेना में पिछले कुछ समय से हुए विभाजन के बाद दोनों गुट अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में ‘ऑपरेशन टाइगर’ को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य कार्यकर्ताओं को एकजुट करना और संगठन को मजबूत बनाना है।
फिलहाल दीपक केसरकर के बयान के बाद इस अभियान को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं और आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक असर पर भी नजर बनी रहेगी।





