महाराष्ट्र

कुंभ बजट का 0.1% शिक्षा को मिले तो सैकड़ों स्कूल बच सकते हैं: जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

Kavita2
24 Aug 2026 4:56 PM IST
कुंभ बजट का 0.1% शिक्षा को मिले तो सैकड़ों स्कूल बच सकते हैं: जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
x

मुंबई। देश में बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए होने वाले भारी-भरकम खर्च के बीच शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की टिप्पणी ने नई बहस छेड़ दी है। महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम के दौरान शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कुंभ मेले के बजट का केवल 0.1 प्रतिशत हिस्सा भी स्कूलों को उपलब्ध कराया जाता, तो राज्य के सैकड़ों स्कूलों को बचाया जा सकता था।

जस्टिस वराले ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की, जब महाराष्ट्र सरकार की ओर से नासिक कुंभ मेले के लिए बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे के विकास की योजनाएं बताई गई हैं। उनके मुताबिक, सरकार विकास कार्यों पर बड़ी राशि खर्च कर रही है, जिस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों की जरूरत को रेखांकित करते हुए सरकारी प्राथमिकताओं पर विचार करने की बात कही।

34 हजार करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का जिक्र

कार्यक्रम के दौरान जस्टिस वराले ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से नासिक कुंभ मेले के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रस्तावित करीब 34,000 करोड़ रुपये के खर्च का उल्लेख किया। इसके अलावा कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए करीब 11,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की घोषणा का भी संदर्भ सामने आया।

उन्होंने कहा कि बड़े धार्मिक आयोजन के लिए आधारभूत ढांचे का निर्माण और विकास कार्य करना सरकार की जरूरतों का हिस्सा हो सकता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि विकास कार्यों पर खर्च किए जाने वाले इस तरह के बड़े बजट पर उन्हें आपत्ति नहीं है।

हालांकि, इसी संदर्भ में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र की स्थिति पर ध्यान आकर्षित किया और सवाल उठाया कि यदि इस बड़ी राशि का बहुत छोटा हिस्सा भी स्कूलों को मजबूत करने में लगाया जाए, तो इसका समाज पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

0.1 प्रतिशत बजट का उदाहरण

जस्टिस वराले ने कहा कि कुंभ मेले के लिए आवंटित बजट का यदि सिर्फ 0.1 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा व्यवस्था को मिल जाता तो महाराष्ट्र में बंद पड़े बड़ी संख्या में क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों को बचाया जा सकता था।

उन्होंने अनुमान के तौर पर बताया कि करीब 32 करोड़ रुपये की राशि से राज्य में बंद पड़े लगभग 100 से 125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बचाने में मदद मिल सकती थी।

उनकी टिप्पणी का मूल उद्देश्य शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर देना था। उन्होंने यह संकेत दिया कि शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत छोटी राशि का निवेश भी लंबे समय में समाज के लिए बड़ा परिणाम दे सकता है।

मराठी माध्यम के स्कूलों की स्थिति पर चिंता

महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। कई स्थानों पर विद्यार्थियों की संख्या कम होने, बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक कारणों से स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है।

जस्टिस वराले ने क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों का उल्लेख करते हुए शिक्षा और भाषा के बीच संबंध को भी अप्रत्यक्ष रूप से रेखांकित किया। स्थानीय भाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने वाले स्कूल ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ऐसे स्कूलों के बंद होने से विद्यार्थियों को दूर के विद्यालयों में जाना पड़ सकता है। इसका असर विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और निम्न आय वाले परिवारों पर पड़ सकता है।

शिक्षा में निवेश को बताया महत्वपूर्ण

जस्टिस वराले की टिप्पणी ने शिक्षा में सरकारी निवेश को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना रहा है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, भवन, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, डिजिटल सुविधाएं और स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होना जरूरी है।

यदि स्कूलों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे तो विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना मुश्किल होगा। ऐसे में स्कूलों को बंद करने के बजाय उनकी बुनियादी स्थिति सुधारने और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के उपाय किए जाने की जरूरत है।

बड़े आयोजनों और सामाजिक प्राथमिकताओं पर बहस

कुंभ जैसे आयोजन धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं। इनके आयोजन के लिए सड़क, परिवहन, स्वच्छता, सुरक्षा, जलापूर्ति और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना पड़ता है। इस कारण सरकारों को बड़े स्तर पर धन खर्च करना पड़ता है।

दूसरी ओर, ऐसे आयोजनों पर होने वाले खर्च की तुलना शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक क्षेत्रों की जरूरतों से किए जाने पर सार्वजनिक बहस होना स्वाभाविक है। जस्टिस वराले की टिप्पणी ने इसी बहस को एक नया संदर्भ दिया है।

उनकी बात का आशय बड़े आयोजनों के विकास कार्यों को रोकने से अधिक इस बात पर ध्यान दिलाना था कि शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र में भी पर्याप्त निवेश होना चाहिए।

स्कूल बचाने के लिए छोटी राशि भी अहम

जस्टिस वराले ने जिस 0.1 प्रतिशत राशि का उदाहरण दिया, वह इस बात को सामने रखता है कि बड़े बजट की तुलना में छोटी राशि भी यदि सही जगह खर्च की जाए तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।

करीब 32 करोड़ रुपये से 100 से 125 स्कूलों को बचाने की संभावना का उदाहरण शिक्षा के प्रति नीति-निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करने वाला है। यदि स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं मजबूत हों और विद्यार्थियों को बेहतर माहौल मिले तो क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।

सार्वजनिक बहस को मिला नया आधार

जस्टिस वराले की टिप्पणी के बाद अब यह चर्चा तेज होने की संभावना है कि सरकारों को विकास परियोजनाओं और सामाजिक क्षेत्रों के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए। धार्मिक आयोजन, बुनियादी ढांचा और शिक्षा सभी अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सीमित संसाधनों के बीच प्राथमिकताओं का निर्धारण भी जरूरी है।

शिक्षा को लेकर की गई यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूल किसी भी समाज की बुनियादी संरचना का हिस्सा होते हैं। स्कूलों में किया गया निवेश सीधे बच्चों के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की क्षमता से जुड़ता है।

फिलहाल जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की टिप्पणी ने महाराष्ट्र में शिक्षा व्यवस्था, बंद हो रहे क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों और सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर एक नई बहस को जन्म दिया है। कुंभ के बड़े बजट के संदर्भ में शिक्षा के लिए केवल 0.1 प्रतिशत राशि के इस्तेमाल का उनका उदाहरण इस सवाल को सामने रखता है कि विकास के साथ सामाजिक क्षेत्र में निवेश का संतुलन किस तरह कायम किया जाए।

Next Story