मध्य प्रदेश

खुद लिखी अपनी किस्मत, ग्रामीणों ने पहाड़ काटकर बनाई 4 KM सड़क

Rajeshwari Nishad
27 Oct 2026 8:46 PM IST
खुद लिखी अपनी किस्मत, ग्रामीणों ने पहाड़ काटकर बनाई 4 KM सड़क
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छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के आदिवासी अंचल में बसे जामुन डोंगा के ग्रामीणों ने सड़क की समस्या से परेशान होकर आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल पेश की है। आजादी के दशकों बाद भी गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुंचने से परेशान ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से उम्मीद लगाए रखने के बजाय खुद पहल करने का फैसला किया। बीते सितंबर महीने में ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से रास्ते की समस्या का समाधान तलाशने की दिशा में कदम बढ़ाया। गांव के लोगों की इस पहल ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर किया है। यहां सड़क नहीं होने के कारण मरीजों को अस्पताल पहुंचाने, बच्चों को स्कूल भेजने और दैनिक जरूरतों के लिए आवागमन करने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
आजादी के दशकों बाद भी सड़क का इंतजार
छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव विकासखंड की ग्राम पंचायत गोप के अंतर्गत चीटीपाठा, जिसे जामुन डोंगा के नाम से भी जाना जाता है, दुर्गम आदिवासी क्षेत्र में स्थित है।यहां के ग्रामीण लंबे समय से सड़क की समस्या से जूझ रहे हैं। गांव तक सुगम सड़क नहीं होने के कारण लोगों को कच्चे और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।बरसात के दिनों में स्थिति और गंभीर हो जाती है। रास्तों पर कीचड़ और फिसलन बढ़ने से पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।स्थानीय लोगों के अनुसार, सड़क निर्माण की मांग कई बार संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने उठाई गई, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सका।इस स्थिति से परेशान ग्रामीणों ने अब सामूहिक प्रयास से रास्ता बेहतर बनाने का संकल्प लिया है।
ग्रामीणों ने खुद पहल करने का लिया फैसला
लंबे समय से सड़क की मांग पूरी नहीं होने पर गांव के लोगों ने बीते महीने आपसी चर्चा के बाद खुद आगे आने का फैसला किया।ग्रामीणों का मानना है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में उनका दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है।ऐसे में केवल सरकारी सहायता का इंतजार करने के बजाय आपसी सहयोग से रास्ते को सुगम बनाने की पहल आवश्यक हो गई थी।ग्रामीणों का यह निर्णय सामूहिक एकजुटता का उदाहरण माना जा रहा है।हालांकि, ग्रामीणों द्वारा किए गए सड़क संबंधी कार्य की कुल लंबाई, खर्च, श्रमदान करने वालों की संख्या और अब तक पूरे हुए निर्माण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।इसलिए इसे पूरी तरह तैयार पक्की सड़क के बजाय ग्रामीणों की स्वप्रेरित पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।
डोली में गर्भवती महिला को ले जाने की घटना ने झकझोरा
जामुन डोंगा में सड़क नहीं होने की समस्या अगस्त 2026 में उस समय चर्चा में आई थी, जब एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डोली का सहारा लेना पड़ा।रिपोर्टों के अनुसार, गांव की 22 वर्षीय कुस्तरिया मलगाम को प्रसव पीड़ा शुरू होने पर परिवार के सदस्य और ग्रामीण लगभग आठ किलोमीटर तक डोली में लेकर चले।गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस वहां नहीं पहुंच सकी थी।परिजन महिला को ग्राम पंचायत गोप के पास तक लेकर पहुंचे, जहां से एंबुलेंस की मदद से उसे दमुआ अस्पताल पहुंचाया गया।इसके बाद हालत गंभीर होने पर महिला को छिंदवाड़ा जिला अस्पताल रेफर किया गया।अस्पताल में महिला ने मृत बच्चे को जन्म दिया। इस घटना ने गांव की बदहाल सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
करीब 125 परिवारों की बस्ती में मूलभूत सुविधाओं की कमी
प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, जामुन डोंगा में लगभग 125 घर हैं।यहां रहने वाले लोग लंबे समय से सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत करते रहे हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं होती, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बाजार तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम होती है।जब किसी गांव में चारपहिया वाहन नहीं पहुंच पाते, तो बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना बड़ी चुनौती बन जाता है।बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों को ऐसी परिस्थितियों में सबसे अधिक परेशानी होती है।इसी वजह से गांव के लोग सड़क की समस्या का जल्द समाधान चाहते हैं।
बारिश में बढ़ जाती हैं ग्रामीणों की मुश्किलें
जामुन डोंगा और आसपास का इलाका पहाड़ी तथा वन क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।बारिश के दौरान कच्चे रास्तों पर पानी भरने और फिसलन बढ़ने से आवागमन प्रभावित हो सकता है।कई बार ग्रामीणों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।स्कूल जाने वाले बच्चों और रोजमर्रा के काम से बाहर निकलने वाले लोगों को भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।यदि किसी मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो, तो सड़क की अनुपलब्धता स्थिति को और गंभीर बना सकती है।सितंबर में जुन्नारदेव विकासखंड के एक अन्य गांव पील्हावाड़ी से भी बीमार महिला को डोली के सहारे तीन उफनती नदियां पार कर अस्पताल पहुंचाने की घटना सामने आई थी।इससे स्पष्ट होता है कि दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में सड़क और सुरक्षित आवागमन की समस्या केवल एक गांव तक सीमित नहीं है।
सड़क नहीं होने से प्रभावित होती है बच्चों की पढ़ाई
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क बेहतर होने से विद्यार्थियों को स्कूल पहुंचने में आसानी होती है।दुर्गम रास्तों के कारण बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय आने-जाने में परेशानी हो सकती है।विशेष रूप से बारिश के दिनों में रास्ते खराब होने पर स्कूल तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।यदि परिवहन सुविधा उपलब्ध नहीं हो, तो बच्चों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।इसलिए जामुन डोंगा के ग्रामीणों के लिए सड़क निर्माण केवल सुविधा का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा है।बेहतर संपर्क मार्ग बनने से शिक्षा और दूसरी आवश्यक सेवाओं तक पहुंच आसान हो सकती है।
खेती और रोजगार पर भी पड़ता है असर
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सड़क की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने के लिए परिवहन की जरूरत पड़ती है।यदि गांव तक वाहन नहीं पहुंच पाते, तो कृषि उत्पादों की ढुलाई मुश्किल और खर्चीली हो सकती है।इसी तरह मजदूरी और रोजगार के लिए दूसरे स्थानों पर जाने वाले लोगों को भी परेशानी होती है।सड़क बेहतर होने पर छोटे कारोबार, कृषि गतिविधियों और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलने की संभावना रहती है।इस दृष्टि से जामुन डोंगा के ग्रामीणों की पहल आर्थिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
विधानसभा में भी उठ चुका है सड़क का मुद्दा
गोप से जामुन डोंगा तक सड़क निर्माण का सवाल पहले मध्य प्रदेश विधानसभा में भी उठाया जा चुका है।विधानसभा के अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 2021 और 2024 में क्षेत्र की विभिन्न ग्रामीण सड़कों के संबंध में सवाल पूछे गए थे।इनमें गोप से जामुन डोंगा तक लगभग तीन किलोमीटर सड़क निर्माण का उल्लेख भी शामिल था।
इससे पता चलता है कि इस मार्ग की मांग नई नहीं है।
क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों द्वारा सड़क निर्माण की आवश्यकता पहले भी शासन के समक्ष रखी गई थी।हालांकि, अब तक इस विशेष मार्ग के निर्माण की वर्तमान सरकारी स्वीकृति और समयसीमा की पुष्टि आवश्यक है।
ग्रामीणों की पहल से प्रशासन के सामने चुनौती
जामुन डोंगा के लोगों द्वारा स्वयं पहल करने का निर्णय एक ओर उनकी एकजुटता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल भी खड़े करता है।ग्रामीणों का कहना है कि सड़क जैसी मूलभूत सुविधा के लिए उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा है।हालांकि, ग्रामीणों का सामूहिक प्रयास सराहनीय है, लेकिन स्थायी और सुरक्षित सड़क निर्माण के लिए तकनीकी मानकों का पालन जरूरी होता है।पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क बनाते समय जल निकासी, ढलान, मिट्टी की मजबूती और पर्यावरण संबंधी पहलुओं का ध्यान रखना आवश्यक है।इसलिए ऐसी पहल को प्रशासनिक सहयोग और तकनीकी मार्गदर्शन मिलना भी जरूरी है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से मिल सकती है मदद
केंद्र सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना चला रही है।इस योजना का उद्देश्य पात्र ग्रामीण बसावटों को हर मौसम में उपयोगी सड़क संपर्क उपलब्ध कराना है।विशेष रूप से आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों के लिए कुछ अलग पात्रता प्रावधान निर्धारित किए गए हैं।हालांकि, किसी गांव को योजना का लाभ तभी मिल सकता है, जब वह संबंधित मानदंडों को पूरा करता हो और परियोजना को आवश्यक स्वीकृति मिले।जामुन डोंगा में स्थायी सड़क के निर्माण के लिए भी संबंधित विभागों द्वारा योजना, तकनीकी सर्वेक्षण और स्वीकृति की स्थिति स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
दूसरे गांवों के लिए बनी प्रेरणा
जामुन डोंगा के ग्रामीणों का फैसला इस बात का उदाहरण है कि सामूहिक सहयोग से स्थानीय समस्याओं के समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।हालांकि, ग्रामीणों की पहल सरकार की जिम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकती।गांवों तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली जैसी सुविधाएं पहुंचाना संबंधित विभागों और प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
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