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मध्य प्रदेश
साल के पेड़ों का दुश्मन लौटा बोरर कीट ने बढ़ाई चिंता
Ratna Netam
14 Sept 2026 6:43 PM IST

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भोपाल। मध्य प्रदेश के घने साल के जंगलों पर करीब 27 साल बाद एक बार फिर गंभीर खतरा मंडराने की खबर है। साल के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले बोरर कीट का प्रकोप सामने आने के बाद वन विभाग की चिंता बढ़ गई है। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए प्रभावित इलाकों में बड़े स्तर पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। जानकारी के मुताबिक करीब **1.46 लाख प्रभावित पेड़ों को काटने की तैयारी** है, ताकि कीट का संक्रमण स्वस्थ पेड़ों तक पहुंचने से रोका जा सके।
साल के जंगल मध्य प्रदेश की वन संपदा और जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों पर कीट के हमले की सूचना वन प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। वन विभाग के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता प्रभावित पेड़ों की पहचान करने के साथ संक्रमण की सीमा का आकलन करना और स्वस्थ जंगल को बचाना है।
बोरर यानी तना छेदक कीट पेड़ के तने में प्रवेश कर उसे अंदर से नुकसान पहुंचाता है। संक्रमण गंभीर होने पर पेड़ कमजोर होने लगता है और आखिरकार सूख सकता है। ऐसे कीटों के प्रकोप में शुरुआती पहचान महत्वपूर्ण होती है क्योंकि संक्रमित पेड़ों से दूसरे पेड़ों तक इनके फैलने की आशंका बनी रहती है।
मध्य प्रदेश में साल के जंगलों पर इस तरह का संकट नया नहीं है। करीब 27 साल पहले भी साल के जंगलों में बोरर कीट के बड़े प्रकोप की स्थिति सामने आने की बात कही जा रही है। अब लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर संक्रमण की खबर ने पुराने संकट की याद ताजा कर दी है।
इस बार सबसे चिंताजनक आंकड़ा प्रभावित पेड़ों की संख्या से जुड़ा है। सामने आई जानकारी के अनुसार लगभग 1.46 लाख पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है। यदि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई होती है तो इसका असर केवल वन क्षेत्र की हरियाली तक सीमित नहीं रहेगा। इससे स्थानीय पारिस्थितिकी और वन्यजीवों के आवास पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन भी जरूरी होगा।
हालांकि प्रभावित पेड़ों को काटने का उद्देश्य जंगल को खत्म करना नहीं बल्कि संक्रमण को नियंत्रित करना बताया जा रहा है। वन प्रबंधन में कई बार गंभीर रूप से संक्रमित या मृत पेड़ों को हटाना पड़ता है ताकि बीमारी या कीट दूसरे स्वस्थ पेड़ों तक न फैल सके। लेकिन इतने बड़े स्तर पर पेड़ हटाने की स्थिति में पूरी प्रक्रिया की वैज्ञानिक निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होगी।
विशेषज्ञों के लिए यह पता लगाना भी जरूरी है कि बोरर कीट का प्रकोप अचानक इतनी तेजी से क्यों बढ़ा। मौसम में बदलाव, तापमान, नमी, जंगल की स्थिति और कमजोर पेड़ों की मौजूदगी जैसे कई कारक कीटों की आबादी को प्रभावित कर सकते हैं। वास्तविक कारण वैज्ञानिक सर्वेक्षण और विस्तृत अध्ययन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
साल का पेड़ भारतीय जंगलों की महत्वपूर्ण प्रजातियों में से एक है। मध्य प्रदेश के पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में साल के विस्तृत जंगल पाए जाते हैं। इन जंगलों से बड़ी संख्या में वन्यजीवों, पक्षियों, कीटों और दूसरे जीवों का जीवन जुड़ा हुआ है। स्थानीय समुदायों के लिए भी वन क्षेत्र कई प्रकार की आजीविका और वन उपज का स्रोत है।
इसी वजह से बोरर का हमला केवल पेड़ों की संख्या से जुड़ा मामला नहीं है। अगर संक्रमण बड़े क्षेत्र में फैलता है तो जंगल के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है। प्रभावित पेड़ों की संख्या बढ़ने पर जंगल की संरचना में बदलाव आने की आशंका भी रहती है।
वन विभाग के लिए अब प्रभावित और स्वस्थ पेड़ों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण होगा। हर उस पेड़ को काटना उचित नहीं होगा जिस पर सामान्य रूप से कोई कीट दिखाई दे। केवल वैज्ञानिक रूप से चिन्हित गंभीर रूप से संक्रमित पेड़ों को हटाना और स्वस्थ पेड़ों की निगरानी करना बेहतर वन प्रबंधन का हिस्सा होगा।
पेड़ों को काटने के बाद उनका निस्तारण भी बेहद महत्वपूर्ण है। संक्रमित लकड़ी को बिना नियंत्रण के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया गया तो कीट के नए क्षेत्रों में फैलने का जोखिम पैदा हो सकता है। इसलिए संक्रमित लकड़ी के परिवहन और निस्तारण के लिए वन विभाग को निर्धारित वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा।
इसके अलावा प्रभावित क्षेत्रों में लगातार निगरानी की आवश्यकता होगी। एक बार संक्रमित पेड़ों को हटाने के बाद यह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा कि संकट खत्म हो गया है। आसपास के स्वस्थ दिखाई देने वाले पेड़ों पर भी कीट के शुरुआती संकेतों की जांच करनी होगी।
जंगल में बोरर के संक्रमण की पहचान के लिए पेड़ों के तने पर बने छेद, लकड़ी का चूर्ण, पेड़ के कमजोर होने और पत्तियों में बदलाव जैसे संकेत उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि अंतिम पहचान वन विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों द्वारा ही की जानी चाहिए।
इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को काटने की तैयारी पर्यावरणीय दृष्टि से भी कई सवाल खड़े करती है। अगर 1.46 लाख पेड़ हटाए जाते हैं तो उसके बाद प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्जीवन और पुनर्वनीकरण की रणनीति क्या होगी, यह महत्वपूर्ण होगा। प्राकृतिक रूप से साल के नए पौधों को विकसित होने देना या जरूरत के अनुसार पौधरोपण करना दीर्घकालिक योजना का हिस्सा हो सकता है।
साल के जंगलों की खासियत यह है कि वे केवल लकड़ी का स्रोत नहीं बल्कि पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का आधार हैं। पेड़ों की छाया जमीन में नमी बनाए रखने में मदद करती है और जंगल की जमीन पर मौजूद वनस्पतियों के लिए विशेष वातावरण तैयार करती है। इन पेड़ों के आसपास कई प्रकार के जीव अपना आवास बनाते हैं।
इसलिए बड़े स्तर पर संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ जंगल की पारिस्थितिक स्थिति को बनाए रखने की योजना भी जरूरी होगी। कटाई के बाद खाली हुए क्षेत्र में मिट्टी के कटाव और बाहरी प्रजातियों के तेजी से फैलने जैसे संभावित प्रभावों पर भी निगरानी करनी पड़ सकती है।
यह मामला जलवायु और वन स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर भी ध्यान खींचता है। तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव कई प्रकार के कीटों के जीवन चक्र को प्रभावित कर सकता है। हालांकि मध्य प्रदेश में मौजूदा बोरर प्रकोप को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होंगे। बिना विस्तृत अध्ययन के ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
वन विभाग के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि साल के जंगल विशाल क्षेत्र में फैले हैं। हर पेड़ की निगरानी आसान नहीं है। ऐसे में प्रभावित इलाकों का नियमित सर्वेक्षण और संदिग्ध पेड़ों की पहचान तेजी से करनी होगी। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी निगरानी में मददगार हो सकता है।
स्थानीय ग्रामीणों और वन समितियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगल के आसपास रहने वाले लोग नियमित रूप से वन क्षेत्र में आते-जाते हैं और पेड़ों में होने वाले बदलाव जल्दी देख सकते हैं। यदि उन्हें संक्रमण के शुरुआती संकेतों के बारे में जानकारी दी जाए तो वे संबंधित वन अमले तक सूचना पहुंचाने में मदद कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या 1.46 लाख पेड़ों को काटने से संक्रमण नियंत्रित हो जाएगा या इसके लिए दूसरी वैज्ञानिक रणनीतियों की भी जरूरत होगी। इसका जवाब वन विभाग और वन अनुसंधान विशेषज्ञों द्वारा किए जाने वाले अध्ययन से ही मिलेगा।
फिलहाल साल के जंगलों में बोरर कीट का प्रकोप वन विभाग के लिए चेतावनी है। करीब 27 साल बाद इस तरह के बड़े खतरे की खबर सामने आने से मध्य प्रदेश की महत्वपूर्ण वन संपदा को सुरक्षित रखने की चुनौती बढ़ गई है।
यदि 1.46 लाख पेड़ों को हटाने की योजना पर अमल किया जाता है तो इस पूरी प्रक्रिया में वैज्ञानिक मूल्यांकन, पारदर्शी निगरानी और प्रभावित वन क्षेत्र के पुनर्जीवन की ठोस योजना बेहद जरूरी होगी। तत्काल लक्ष्य कीट को फैलने से रोकना है, लेकिन लंबी अवधि की चुनौती साल के जंगलों को फिर से स्वस्थ बनाना और भविष्य में ऐसे प्रकोप का समय रहते पता लगाना होगी।
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