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मध्य प्रदेश
बरी कर्मचारी की नौकरी नहीं छीन सकता विभाग हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
nidhi
3 Sept 2026 9:56 AM IST

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कर्मचारी के पक्ष में हाई कोर्ट
जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी सेवा और आपराधिक मामले से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में कर्मचारी के अधिकारों को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी या अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना अपने आप में हर परिस्थिति में उसकी नौकरी समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। खासकर जब संबंधित व्यक्ति ने मामले की जानकारी नहीं छिपाई हो और बाद में अदालत से बरी हो गया हो तो विभाग को उसके मामले पर परिस्थितियों और लागू सेवा नियमों के अनुसार निष्पक्ष तरीके से विचार करना होगा। हाई कोर्ट का यह रुख उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जिनमें सरकारी नौकरी में नियुक्ति या सेवा जारी रखने का सवाल किसी पुराने या लंबित आपराधिक प्रकरण के कारण खड़ा हो जाता है।
केवल आपराधिक मामला होना पर्याप्त नहीं
सरकारी नियुक्तियों में चरित्र सत्यापन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आने पर संबंधित विभाग आरोपों की प्रकृति, मामले की स्थिति और पद की संवेदनशीलता जैसे पहलुओं पर विचार कर सकता है। लेकिन प्रत्येक आपराधिक मामले को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। मामूली विवाद और गंभीर अपराध के आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है। इसी तरह यह भी महत्वपूर्ण है कि उम्मीदवार ने आवेदन के दौरान जानकारी छिपाई थी या उसे ईमानदारी से विभाग के सामने रखा था।
बरी होने के बाद बदल सकती है स्थिति
अगर कर्मचारी को अदालत आपराधिक मामले से बरी कर देती है तो उसके सेवा संबंधी मामले में उस फैसले की प्रकृति महत्वपूर्ण हो सकती है। संबंधित विभाग को यह देखना होगा कि कर्मचारी के खिलाफ कोई स्वतंत्र विभागीय जांच हुई थी या उसकी नौकरी पर कार्रवाई केवल आपराधिक मुकदमे के आधार पर की गई थी। यदि सेवा समाप्त करने का एकमात्र आधार वही आपराधिक मामला था और कर्मचारी बाद में उससे बरी हो गया तो उसके दावे पर दोबारा विचार की स्थिति बन सकती है।
विभागीय जांच हो तो नियम अलग
हालांकि हाई कोर्ट के दूसरे फैसलों से यह भी स्पष्ट है कि आपराधिक मामले में बरी होना प्रत्येक स्थिति में नौकरी वापस मिलने की गारंटी नहीं देता। अगर कर्मचारी के खिलाफ अलग से विभागीय जांच हुई है और उसमें आरोप स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर साबित हुए हैं तो आपराधिक अदालत से बरी होने के बावजूद विभागीय कार्रवाई जारी रह सकती है। आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच में प्रमाण के मानक अलग होते हैं। यही कारण है कि ऐसे मामलों में प्रत्येक प्रकरण के तथ्य और विभागीय कार्रवाई का आधार बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
जानकारी छिपाना भी महत्वपूर्ण मुद्दा
सरकारी नौकरी के आवेदन के समय उम्मीदवार से अगर किसी आपराधिक मामले, गिरफ्तारी या मुकदमे की जानकारी मांगी गई है तो सही जानकारी देना जरूरी है जानबूझकर जानकारी छिपाने और ईमानदारी से पूरी जानकारी देने वाले उम्मीदवार की स्थिति समान नहीं मानी जा सकती। अदालतें ऐसे मामलों में यह भी देखती हैं कि उम्मीदवार ने कोई तथ्य छिपाया था या नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान स्वयं संबंधित जानकारी विभाग को दी थी।
संवेदनशील सेवाओं में ज्यादा कड़े मानक
पुलिस, अर्धसैनिक बल और दूसरी अनुशासित सेवाओं में नियुक्ति के दौरान चरित्र और आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच के मानक सामान्य पदों की तुलना में अधिक सख्त हो सकते हैं। ऐसे पदों पर विभाग उम्मीदवार की उपयुक्तता का स्वतंत्र आकलन कर सकता है। इसलिए हाई कोर्ट के फैसले को यह समझना सही नहीं होगा कि किसी भी आपराधिक मामले में बरी होते ही कर्मचारी को नौकरी देने या बहाल करने की बाध्यता पैदा हो जाती है।
कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है फैसला
इस तरह के फैसले सरकारी कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें एक तरफ प्रशासन को योग्य और उपयुक्त कर्मचारियों के चयन का अधिकार दिया गया है तो दूसरी तरफ मनमाने तरीके से रोजगार छीनने पर न्यायिक नियंत्रण भी बना रहता है। विभाग को निर्णय लेते समय अपराध की प्रकृति, अदालत का अंतिम फैसला, उम्मीदवार द्वारा दी गई जानकारी, पद की प्रकृति और विभागीय जांच जैसे पहलुओं पर विचार करना पड़ सकता है।
हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा अधिकार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के विभिन्न फैसलों से एक बात स्पष्ट होती है कि आपराधिक मामले में बरी होने के बाद सरकारी नौकरी से जुड़ा विवाद किसी एक सामान्य नियम से तय नहीं किया जा सकता। अगर विभागीय जांच में स्वतंत्र रूप से आरोप साबित हुए हैं तो बरी होने के बावजूद कर्मचारी को राहत नहीं भी मिल सकती है। वहीं यदि नौकरी से हटाने का आधार केवल आपराधिक मामला था और कर्मचारी ने उससे संबंधित जानकारी ईमानदारी से दी थी तो अदालत विभाग की कार्रवाई की वैधता की जांच कर सकती है। इसलिए इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि सरकारी विभाग को सेवा समाप्त करने जैसे गंभीर निर्णय में मनमानी के बजाय कानून, सेवा नियमों और मामले की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेना होगा।
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