मध्य प्रदेश

अविवाहित बेटी के भरण-पोषण पर कोर्ट का फैसला

Saba Naaz
14 July 2026 6:10 PM IST
अविवाहित बेटी के भरण-पोषण पर कोर्ट का फैसला
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जबलपुर, 14 जुलाई। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बालिग अविवाहित बेटी अपनी आय या संपत्ति के जरिए खुद का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो वह अपने पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आवेदन में गलत कानूनी धारा का उल्लेख होने के कारण किसी जरूरतमंद व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि न्यायालय का उद्देश्य तकनीकी आधार पर राहत को खारिज करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति को न्याय उपलब्ध कराना है। अदालत ने कहा कि बालिग बेटी के भरण-पोषण के अधिकार के लिए उसका दिव्यांग होना जरूरी नहीं है। यदि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है, तो पिता की जिम्मेदारी बनती है कि वह उसकी मदद करे।

यह फैसला सतना निवासी गंगा सिंह की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया गया। हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उनकी बेटी रक्षा सिंह को दो हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान पिता की ओर से दलील दी गई थी कि बालिग बेटी को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बेटी ने उनके खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं, इसलिए वह राहत पाने की हकदार नहीं है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कुटुंब न्यायालय को हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) के तहत भी भरण-पोषण देने का अधिकार है। इसलिए यदि किसी आवेदन में गलत कानूनी प्रावधान का उल्लेख हो गया है, तो केवल इसी आधार पर राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कानून का उद्देश्य लोगों को न्याय दिलाना है, न कि केवल तकनीकी खामियों के आधार पर उनके अधिकारों को खत्म करना। यदि कोई बेटी अविवाहित है और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रखती है, तो उसे पिता से सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।

हाई कोर्ट के इस फैसले को महिलाओं और बेटियों के अधिकारों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि माता-पिता की जिम्मेदारी केवल नाबालिग बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में बालिग अविवाहित बेटियों के प्रति भी उनका दायित्व बना रहता है।

इस फैसले के बाद यह संदेश गया है कि आर्थिक रूप से निर्भर बालिग बेटियों को कानून संरक्षण देता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि न्याय पाने के लिए तकनीकी गलतियां बाधा नहीं बन सकतीं, बशर्ते व्यक्ति राहत पाने का वास्तविक हकदार हो।

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