मध्य प्रदेश

न्याय के लिए छुट्टी के दिन लगी अदालत, दुष्कर्म पीड़िता को मिली राहत

nidhi
8 Nov 2026 9:18 AM IST
न्याय के लिए छुट्टी के दिन लगी अदालत, दुष्कर्म पीड़िता को मिली राहत
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का अहम फैसला
जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण राहत देते हुए 26 सप्ताह का गर्भ चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी है। मामले की गंभीरता और समय की संवेदनशीलता को देखते हुए दीपावली की छुट्टी के बावजूद अदालत ने सुनवाई की। न्यायालय के सामने पीड़िता की शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्थिति और चिकित्सकीय परिस्थितियों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न थे। अदालत ने मामले को प्राथमिकता देते हुए गर्भसमापन की अनुमति प्रदान की।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गर्भावस्था 26 सप्ताह की हो चुकी थी। इतनी अवधि के बाद गर्भसमापन का निर्णय सामान्य परिस्थितियों से अलग होता है और इसमें कानूनी तथा चिकित्सकीय पहलुओं की विशेष जांच आवश्यक होती है। पीड़िता के लिए समय बीतने के साथ चिकित्सा संबंधी जोखिम और कानूनी जटिलताएं बढ़ सकती थीं। ऐसे में मामले की तत्काल सुनवाई आवश्यक मानी गई। दुष्कर्म के कारण गर्भवती होने वाली महिलाओं के सामने कई तरह की चुनौतियां होती हैं। एक ओर उन्हें अपराध से उत्पन्न मानसिक आघात का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर अनचाही गर्भावस्था उनकी शारीरिक और भावनात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में गर्भसमापन का निर्णय पीड़िता की इच्छा, स्वास्थ्य और कानून के प्रावधानों के अनुसार लिया जाता है।
मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने की। पीड़िता शिवपुरी जिले की रहने वाली 14 वर्षीय नाबालिग है। उसकी गर्भावस्था 26 सप्ताह और एक दिन की हो चुकी थी। शिवपुरी की निचली अदालत ने इस संवेदनशील मामले में हाई कोर्ट से दिशा-निर्देश मांगे थे।
मेडिकल बोर्ड की पहली रिपोर्ट में बताया गया था कि उचित चिकित्सकीय सुविधाओं की उपलब्धता में गर्भसमापन संभव है। हालांकि, रिपोर्ट में स्पष्ट राय नहीं दी गई थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से दोबारा स्पष्टीकरण मांगा। दूसरी रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़िता की ईको जांच सामान्य है और आवश्यक रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करके चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। अदालत ने कमलाराजा अस्पताल और जीआर मेडिकल कॉलेज के डीन को अनुभवी चिकित्सकों की विशेष टीम गठित करने का निर्देश दिया। इस टीम में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, मेडिसिन और शिशु रोग विशेषज्ञों को शामिल करने के लिए कहा गया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गर्भसमापन से पहले पीड़िता की आवश्यक चिकित्सकीय जांच दोबारा की जाए। प्रक्रिया के दौरान रक्तस्राव और अन्य संभावित जटिलताओं से निपटने के लिए सभी आवश्यक इंतजाम उपलब्ध रहने चाहिए। अदालत ने पीड़िता की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में ही प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता और उसके अभिभावकों को गर्भसमापन से जुड़े संभावित जोखिमों की जानकारी देने और कानून के अनुसार आवश्यक सहमति प्राप्त करने को कहा। चिकित्सकीय रिकॉर्ड तथा संबंधित नमूनों को सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। जरूरत पड़ने पर डीएनए जांच के लिए नमूने संरक्षित किए जाएंगे, ताकि आपराधिक मामले की जांच में आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध रह सकें।
न्यायालय ने मामले में देरी को गंभीर बताते हुए कहा कि एक दिन की देरी भी महत्वपूर्ण चिकित्सकीय और कानूनी परिणाम पैदा कर सकती है। इसी कारण दीपावली अवकाश के दौरान विशेष सुनवाई कर आवश्यक आदेश पारित किया गया। भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम के तहत निर्धारित परिस्थितियों में गर्भसमापन की अनुमति दी जाती है। दुष्कर्म पीड़िताओं और नाबालिगों सहित कुछ विशेष श्रेणियों के लिए 24 सप्ताह तक गर्भसमापन का प्रावधान है। इससे अधिक अवधि के मामलों में विशेष कानूनी और चिकित्सकीय परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक होता है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फरवरी 2025 में ऐसे मामलों के लिए दिशा-निर्देश भी निर्धारित किए थे, जिनमें यौन अपराध की पीड़िता की गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक हो। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य पीड़िता को समय पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना और अनावश्यक देरी रोकना है। इस मामले में अदालत के आदेश के बाद अब चिकित्सकों की विशेषज्ञ टीम निर्धारित सुरक्षा उपायों के साथ आगे की प्रक्रिया पूरी करेगी। गर्भसमापन की अनुमति दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
दीपावली की छुट्टी के दौरान हुई इस विशेष सुनवाई ने यह स्पष्ट किया कि समय की संवेदनशीलता वाले मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अदालत ने नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा, आवश्यक सहमति, चिकित्सकीय निगरानी और आपराधिक जांच के लिए साक्ष्य संरक्षण को ध्यान में रखते हुए आदेश दिया है।
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