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कर्नाटक के निजी विश्वविद्यालयों की होगी व्यापक जांच, पांच साल की ऑडिट रिपोर्ट और छात्र उपस्थिति मांगी

Kavita2
1 Oct 2026 11:06 AM IST
कर्नाटक के निजी विश्वविद्यालयों की होगी व्यापक जांच, पांच साल की ऑडिट रिपोर्ट और छात्र उपस्थिति मांगी
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बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने राज्य के सभी निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की वित्तीय, शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की विस्तृत जांच शुरू करने का फैसला किया है। उच्च शिक्षा विभाग ने इन संस्थानों से पिछले पांच वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट, छात्र उपस्थिति, फीस संरचना, दाखिला प्रक्रिया, बैंक खातों, निवेश, स्टाफ भर्ती और अन्य रिकॉर्ड जमा करने को कहा है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद उठाया गया है।

बुधवार को कर्नाटक राज्य उच्च शिक्षा परिषद में इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता उच्च शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव तुलसी मद्दीनेनी ने की। इसमें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, रजिस्ट्रारों और वित्त अधिकारियों को बुलाया गया था। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि मांगे गए सभी दस्तावेज हार्ड कॉपी और सॉफ्ट कॉपी दोनों रूपों में जमा किए जाएं।

राज्य में फिलहाल 28 निजी विश्वविद्यालय, एक पब्लिक-प्राइवेट विश्वविद्यालय और 11 डीम्ड विश्वविद्यालय हैं। इन सभी संस्थानों से विस्तृत रिकॉर्ड मांगे गए हैं। हालांकि बैठक के दौरान कुछ विश्वविद्यालयों ने बड़ी छात्र संख्या का हवाला देते हुए कहा कि इतने व्यापक स्तर पर डेटा तैयार करना और जमा करना कठिन हो सकता है। इसके बावजूद विभाग ने रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा है।

वित्तीय जांच के तहत विश्वविद्यालयों को पिछले पांच वर्षों के हस्ताक्षरित और ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण जमा करने होंगे। इसके अलावा इनकम टैक्स रिटर्न, टैक्स गणना से जुड़े रिकॉर्ड, जनरल लेजर, बैंक स्टेटमेंट, कैश बुक, निवेश से संबंधित दस्तावेज और अलग-अलग फंड के शुरुआती तथा अंतिम बैलेंस की जानकारी भी मांगी गई है।

उच्च शिक्षा विभाग ने फीस से जुड़े दस्तावेज भी तलब किए हैं। विश्वविद्यालयों को कोर्सवार फीस संरचना, विकास शुल्क, विशेष कार्यक्रमों के नाम पर ली गई राशि, प्रवेश फीस और अन्य शुल्कों का विवरण देना होगा। इसके साथ ही छात्रों से फीस वसूली, रिफंड और छात्रवृत्ति से संबंधित रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में होंगे।

दाखिला प्रक्रिया की भी विस्तार से जांच की जाएगी। विश्वविद्यालयों से प्रवेश नियम, प्रॉस्पेक्टस, मेरिट सूची, प्रवेश परीक्षा से जुड़े रिकॉर्ड और छात्र लेजर मांगे गए हैं। विभाग यह देखना चाहता है कि निजी विश्वविद्यालय छात्रों को प्रवेश देने में तय नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं या नहीं।

शैक्षणिक गतिविधियों की जांच के तहत छात्र उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। विश्वविद्यालयों से स्टाफ और छात्रों की उपस्थिति, टाइम टेबल, क्लास रजिस्टर, पाठ्यक्रम स्वीकृति, प्रत्येक कोर्स में स्वीकृत सीटों की संख्या, परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्र तैयार करने और उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी मांगी गई है।

विश्वविद्यालयों में कर्मचारियों की भर्ती और वेतन भुगतान भी जांच के दायरे में है। संस्थानों को शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा नियम, कॉन्ट्रैक्ट, पेरोल और पारिश्रमिक से संबंधित जानकारी उपलब्ध करानी होगी। इसके जरिए यह जांचा जाएगा कि कर्मचारियों की नियुक्ति और भुगतान में निर्धारित नियमों का पालन किया गया या नहीं।

इसके अलावा विश्वविद्यालय चलाने वाली ट्रस्ट, सोसायटी या अन्य संस्थाओं की जानकारी भी मांगी गई है। बोर्ड सदस्यों, संबंधित पक्षों के साथ वित्तीय लेन-देन, प्रबंधन से जुड़े लोगों को किए गए भुगतान, लीज, खरीद प्रक्रिया, सेवा अनुबंध और उनसे संबंधित बिल तथा भुगतान रिकॉर्ड भी जांच में शामिल होंगे।

इन सभी रिपोर्टों की जांच के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने एक ऑडिटर और एक कानूनी सलाहकार को नियुक्त किया है। इनका काम विश्वविद्यालयों द्वारा सौंपे गए वित्तीय और प्रशासनिक दस्तावेजों की जांच करना तथा यह देखना होगा कि कहीं नियमों या कानूनों का उल्लंघन तो नहीं हुआ।

यह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट के 17 सितंबर 2026 के आदेश के बाद शुरू हुई है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया था। अदालत ने निजी विश्वविद्यालयों से पिछले पांच वर्षों के वित्तीय रिकॉर्ड, फीस संरचना, निवेश, सरकारी लाभ और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी मांगी है।

मामला आयशा जैन बनाम एमिटी यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ था। याचिका एक छात्रा की शिकायत से जुड़ी थी, लेकिन सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसका दायरा बढ़ाकर देशभर के निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली और नियमन की जांच तक कर दिया। इससे पहले भी अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से निजी विश्वविद्यालयों से जुड़े अनुपालन मामलों पर विस्तृत हलफनामे मांगे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि निजी विश्वविद्यालयों को केवल मुनाफा कमाने वाली संस्थाओं के रूप में काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि विश्वविद्यालयों के सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और उचित रिजर्व जरूरी हैं। सवाल यह है कि संस्थानों की आय और अतिरिक्त धन का उपयोग वास्तव में शिक्षा से जुड़े उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है या नहीं।

अदालत ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह सप्ताह के भीतर संबंधित विश्वविद्यालयों से जानकारी लेकर हलफनामा दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

कर्नाटक उच्च शिक्षा विभाग की मौजूदा कार्रवाई इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। विभाग को अब बड़ी मात्रा में रिकॉर्ड का सत्यापन करना होगा। इसमें वित्तीय लेन-देन से लेकर छात्र उपस्थिति, शिक्षक नियुक्ति और फीस वसूली तक कई पहलुओं की जांच की जाएगी।

फिलहाल सभी निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है कि वे मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध कराएं। रिपोर्टों की जांच ऑडिटर और कानूनी सलाहकार करेंगे और उसके बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी अनुपालन रिपोर्ट पेश करेगी। इस प्रक्रिया से कर्नाटक के निजी उच्च शिक्षा संस्थानों की वित्तीय और प्रशासनिक पारदर्शिता पर व्यापक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।

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