
बेंगलुरु। कर्नाटक में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया को लेकर विवाद तेज हो गया है। SIR-विरोधी गठबंधन ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और इसका सबसे ज्यादा असर खानाबदोश समुदायों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर पड़ा है। गठबंधन ने बुधवार को बेंगलुरु में एक SIR ऑडिट रिपोर्ट जारी कर ये आरोप लगाए।
रिपोर्ट सिविल सोसाइटी समूहों द्वारा किए गए जमीनी सत्यापन और मतदाता सूची के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। आयोजकों का कहना है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में जांच के दौरान कई ऐसी गड़बड़ियां सामने आईं, जिनमें मतदाताओं को गलत तरीके से ‘स्थानांतरित’, ‘अनुपस्थित’ या ‘मृत’ की श्रेणी में डालने के आरोप शामिल हैं। ये आरोप रिपोर्ट जारी करने वाले संगठनों के हैं और इनकी अंतिम वैधानिक स्थिति निर्वाचन अधिकारियों की प्रक्रिया और आगे होने वाली जांच पर निर्भर करेगी।
विधायकों के आवास पर आयोजित रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम में ‘वेक अप कर्नाटक’ से जुड़े नूर श्रीधर ने कहा कि निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर किए गए सत्यापन में ऐसे क्षेत्रों में अधिक नाम हटने की बात सामने आई, जहां अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी समुदायों की आबादी अधिक है। उन्होंने दावा किया कि कई मतदाता वास्तविक रूप से अपने पते पर मौजूद होने के बावजूद मतदाता सूची में उनकी स्थिति बदल दी गई।
सिविल सोसाइटी समूहों की एक अन्य जांच में 25 जिलों के करीब 100 मतदान केंद्रों के आंकड़ों और जमीनी स्थिति का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट में मतदाता संख्या में बड़ी गिरावट और ‘शिफ्टेड’ तथा ‘एब्सेंट’ श्रेणी में बड़ी संख्या दर्ज होने पर सवाल उठाए गए। इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को भी गठबंधन ने SIR प्रक्रिया में संभावित विसंगतियों के प्रमाण के रूप में पेश किया है।
SIR प्रक्रिया के दौरान कर्नाटक में लाखों मतदाताओं को दस्तावेजों और पहचान सत्यापन के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर के अंतिम सप्ताह तक लगभग 43.8 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए थे, जिनमें से लगभग 95 प्रतिशत नोटिस वितरित किए जा चुके थे। इससे साफ है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया का दायरा काफी बड़ा है।
इससे पहले मतदाताओं की ओर से भी दस्तावेजों की मांग, नामों में अंतर, नोटिस मिलने में देरी और ऑनलाइन फॉर्म भरने में तकनीकी समस्याओं जैसी शिकायतें सामने आई थीं। कुछ मतदाताओं ने यह भी कहा था कि दस्तावेज जमा करने के बाद उन्हें यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि उनकी जानकारी स्वीकार हुई है या नहीं।
राजनीतिक दलों ने भी SIR को लेकर आपत्तियां उठाई हैं। कांग्रेस ने सितंबर में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर कुछ मतदान केंद्रों पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के बाहर हो जाने का मुद्दा उठाया था। यशवंतपुर विधानसभा क्षेत्र के एक बूथ का उदाहरण देते हुए पार्टी ने दावा किया था कि 1,016 मतदाताओं में से पुनरीक्षण के बाद केवल 389 को वैध सूची में दिखाया गया। यह कांग्रेस का आरोप था, जिस पर निर्वाचन अधिकारियों की अंतिम प्रक्रिया जारी थी।
SIR-विरोधी गठबंधन की रिपोर्ट में सबसे गंभीर चिंता सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के मतदाताओं को लेकर जताई गई है। गठबंधन का कहना है कि खानाबदोश समुदायों, अनुसूचित जाति और जनजाति, अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के पास स्थायी दस्तावेजों या पुराने रिकॉर्ड की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम हो सकती है। ऐसे में दस्तावेज आधारित सत्यापन प्रक्रिया के दौरान उनके नाम कटने का जोखिम अधिक रहता है। यह गठबंधन का विश्लेषण है, जिसे निर्वाचन आयोग की आधिकारिक पुष्टि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट जारी करने वालों ने 2002 की मतदाता सूची से मौजूदा मतदाताओं को जोड़ने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि कई मतदाताओं के लिए दो दशक से अधिक पुराने रिकॉर्ड से संबंध साबित करना मुश्किल हो सकता है। इसी कार्यक्रम में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश गोपाल गौड़ा ने भी SIR प्रक्रिया के कानूनी आधार पर सवाल उठाए।
कार्यक्रम में अभिनेता प्रकाश राज सहित कई सामाजिक और सांस्कृतिक हस्तियां भी मौजूद थीं। गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मौजूदा SIR प्रक्रिया रोकने और गलत तरीके से हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम फिर सूची में जोड़ने जैसी मांगें रखीं। इसके साथ ही उसने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर विशेष विधानसभा सत्र बुलाने और सामाजिक ऑडिट कराने की मांग भी की।
गठबंधन ने यह भी मांग की कि जब तक सभी पात्र मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक SIR से तैयार मतदाता सूची का चुनावों में इस्तेमाल न किया जाए। साथ ही उसने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत करने की मांग उठाई। ये सभी मांगें गठबंधन की ओर से रखी गई राजनीतिक और नागरिक मांगें हैं।
दूसरी ओर SIR प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। मतदाताओं को दस्तावेज जमा करने और आपत्तियां दर्ज कराने के अवसर दिए जा रहे हैं तथा अंतिम मतदाता सूची बाद में प्रकाशित की जानी है। इसलिए मौजूदा ड्राफ्ट सूची में नाम न होना अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होने के बराबर नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि अंतिम सूची जारी होने से पहले दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
कर्नाटक में SIR अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। एक ओर निर्वाचन प्रणाली में गलत या पुराने नामों को हटाकर मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर नागरिक समूह और राजनीतिक दल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से नहीं हटना चाहिए।
फिलहाल SIR-विरोधी गठबंधन की ऑडिट रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अब नजर निर्वाचन अधिकारियों की प्रतिक्रिया, अंतिम मतदाता सूची और उन शिकायतों के निपटारे पर रहेगी, जिनमें मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने या उन्हें अनुचित श्रेणी में डालने का आरोप लगाया गया है।





