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कर्नाटक में ASHA वर्करों का राज्यव्यापी प्रदर्शन, 15 हजार रुपये मासिक भुगतान की मांग

Kavita2
6 Oct 2026 11:22 AM IST
कर्नाटक में ASHA वर्करों का राज्यव्यापी प्रदर्शन, 15 हजार रुपये मासिक भुगतान की मांग
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कर्नाटक : आशा वर्करों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सोमवार से राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। कर्नाटक राज्य संयुक्त आशा वर्कर एसोसिएशन के आह्वान पर शुरू हुए इस आंदोलन में राज्य के अलग-अलग जिलों और तालुक केंद्रों पर बड़ी संख्या में आशा कार्यकर्ता शामिल हुईं। प्रदर्शनकारी मानदेय में बढ़ोतरी, इंसेंटिव का समय पर भुगतान और ऐप आधारित काम से जुड़ी समस्याओं के समाधान की मांग कर रही हैं।

एसोसिएशन के मुताबिक, आशा वर्करों की आर्थिक स्थिति लगातार कठिन होती जा रही है। पिछले नौ वर्षों में महंगाई में काफी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन उनके मानदेय में केवल 1,500 रुपये की वृद्धि की गई है। यूनियन नेताओं का कहना है कि वर्तमान भुगतान बढ़ती महंगाई और काम के बढ़ते बोझ के मुकाबले पर्याप्त नहीं है।

आशा वर्करों की प्रमुख मांग है कि राज्य सरकार की ओर से मिलने वाले मानदेय और केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले इंसेंटिव को मिलाकर कुल मासिक भुगतान कम से कम 15,000 रुपये तय किया जाए। प्रदर्शन कर रही कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार की ओर से पहले इस संबंध में आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक इसे लागू नहीं किया गया है।

राज्य के जिला और तालुक मुख्यालयों में आयोजित प्रदर्शनों के दौरान आशा वर्करों ने अपनी मांगों के समर्थन में आवाज उठाई। एसोसिएशन का कहना है कि राज्यभर में हजारों कार्यकर्ता इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनी हैं। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद उनके आर्थिक और कामकाजी मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

आशा वर्कर स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी कड़ी के तौर पर काम करती हैं। गांवों और शहरी क्षेत्रों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की निगरानी, स्वास्थ्य जागरूकता और विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने जैसे कई कार्य उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा होते हैं। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें मिलने वाला भुगतान उनके काम और जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं है।

एसोसिएशन के नेताओं ने कहा कि पिछले कई वर्षों के दौरान आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं और जीवन-यापन की लागत में भी काफी वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में मानदेय में मामूली बढ़ोतरी से आशा वर्करों की आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। इसी वजह से न्यूनतम 15,000 रुपये मासिक भुगतान की मांग को आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया गया है।

मानदेय के अलावा इंसेंटिव के भुगतान में होने वाली देरी भी प्रदर्शन का बड़ा कारण है। आशा वर्करों को कई स्वास्थ्य कार्यक्रमों और कामों के आधार पर अलग-अलग इंसेंटिव दिए जाते हैं। यूनियन का आरोप है कि कई बार इन भुगतानों में देरी होती है, जिससे कार्यकर्ताओं को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। एसोसिएशन ने मांग की है कि सभी इंसेंटिव तय समय पर और पारदर्शी तरीके से जारी किए जाएं।

आशा वर्करों ने ऐप आधारित काम को लेकर भी कई समस्याएं उठाई हैं। स्वास्थ्य विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों से संबंधित जानकारी और रिपोर्टिंग के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा मोबाइल ऐप का उपयोग बढ़ा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इन ऐप से जुड़े तकनीकी मुद्दे, इंटरनेट की समस्या और बार-बार डेटा दर्ज करने जैसी कठिनाइयों से उनका काम प्रभावित हो रहा है।

यूनियन का कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल काम को आसान बनाने के लिए होना चाहिए, लेकिन यदि तकनीकी खामियों के कारण अतिरिक्त दबाव बढ़ता है तो सरकार को इसका तुरंत समाधान करना चाहिए। एसोसिएशन ने मांग की है कि ऐप आधारित कार्यप्रणाली को सरल बनाया जाए और तकनीकी परेशानियों के कारण आशा वर्करों पर अनावश्यक दबाव न डाला जाए।

प्रदर्शन के जरिए आशा कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार पर अपने पुराने वादे को पूरा नहीं करने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मानदेय और भुगतान से जुड़े मुद्दों को लेकर पहले भी सरकार के सामने मांगें रखी गई थीं, लेकिन ठोस समाधान नहीं निकला। इसी वजह से अब राज्यव्यापी आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा है।

एसोसिएशन के नेताओं का कहना है कि आशा वर्कर स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग और आम लोगों के बीच संपर्क स्थापित करने में उनकी भूमिका अहम है। ऐसे में उनकी आर्थिक सुरक्षा और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

आंदोलन के दौरान आशा वर्करों ने साफ किया है कि उनकी मांग केवल मानदेय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वे नियमित और समय पर भुगतान, काम के बेहतर हालात और डिजिटल कार्यप्रणाली की समस्याओं के समाधान की भी मांग कर रही हैं।

अब नजर राज्य सरकार के रुख पर है। यदि सरकार और आशा वर्कर संगठनों के बीच बातचीत से समाधान नहीं निकलता है तो आंदोलन आगे भी जारी रह सकता है। फिलहाल राज्यभर में शुरू हुए इस प्रदर्शन ने आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय और कामकाजी परिस्थितियों के मुद्दे को एक बार फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है।

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