
बेंगलुरु। जाने-माने अभिनेता और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रकाश राज ने मंगलवार को दावा किया कि बेंगलुरु में उनकी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा करते हुए मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और इसे लेकर अधिकारियों की जवाबदेही पर चिंता जताई।
प्रकाश राज ने कहा कि उन्हें इस बात पर हैरानी है कि जिस शहर से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है, उसी शहर की मतदाता सूची से उनका नाम कैसे हटाया जा सकता है। उन्होंने अपने बेंगलुरु से संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि वह यहीं पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े और शिक्षा हासिल की तथा इसी शहर से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। हालांकि, प्रकाश राज द्वारा बताए गए 65 लाख नाम हटाए जाने का आंकड़ा कर्नाटक के बजाय बिहार में 2025 के SIR के दौरान सामने आया था। बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 65 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरण या अन्य कारण शामिल बताए गए थे।
वीडियो जारी कर जताई नाराजगी
Fraand 😂😂 you may chose n deny voting rights of few citizens who may not elect you back to thrown.. but can you stop us from eventually bringing you down from your thrown #justasking pic.twitter.com/S8BpM3CNy0
— Prakash Raj (@prakashraaj) August 11, 2026
प्रकाश राज ने X पर जारी वीडियो में मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने मतदाता पंजीकरण व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर चिंता जाहिर की और पूछा कि अगर उनका नाम सूची में नहीं है तो इसके पीछे क्या वजह है।
उन्होंने अपने बेंगलुरु से पुराने संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि वह इस शहर में पैदा हुए, यहीं बड़े हुए और यहीं शिक्षा प्राप्त की। इसके अलावा उन्होंने इसी क्षेत्र से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। ऐसे में उनके मुताबिक मतदाता सूची से नाम हटना गंभीर सवाल खड़े करता है।
उनकी टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। समर्थकों ने मतदाता सूची की जांच और पारदर्शिता की मांग की, जबकि राजनीतिक बहस में उनके पुराने चुनावी रिकॉर्ड और मतदाता पहचान से जुड़े विवाद का भी उल्लेख होने लगा।
65 लाख नामों का आंकड़ा बिहार से जुड़ा
प्रकाश राज ने अपने बयान में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का जिक्र किया। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 65 लाख नाम हटाए जाने का आंकड़ा कर्नाटक के मौजूदा SIR से संबंधित नहीं है।
2025 में बिहार में हुए SIR के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने पर करीब 65 लाख नाम बाहर रह गए थे। बाद की प्रक्रिया में दावों और आपत्तियों के बाद कुछ बदलाव भी हुए। रिपोर्टों के अनुसार, हटाए गए नामों में बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की थी जिन्हें मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित या अन्य स्थान पर पंजीकृत बताया गया था।
इसी वजह से SIR को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष रहा है कि मतदाता सूची को अपडेट रखना और अपात्र या गलत प्रविष्टियों को हटाना जरूरी है।
कर्नाटक में SIR को लेकर पहले से विवाद
कर्नाटक में भी SIR को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस चलती रही है। नागरिक संगठनों और विपक्षी समूहों की ओर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और संभावित गलत विलोपन की आशंकाएं जताई गई हैं।
ऐसे माहौल में प्रकाश राज का अपना नाम सूची से हटाए जाने का दावा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि उनके नाम के हटाए जाने की वास्तविक वजह और रिकॉर्ड की स्थिति संबंधित चुनावी अधिकारियों के आधिकारिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
प्रकाश राज पहले भी रहे हैं चुनावी विवाद में
प्रकाश राज का नाम मतदाता सूची से जुड़ी बहस में इससे पहले भी सामने आ चुका है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान उनके नाम से कथित तौर पर एक से अधिक मतदाता पहचान रिकॉर्ड जुड़े होने को लेकर शिकायत की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनका नाम अलग-अलग राज्यों की मतदाता सूचियों में दर्ज था।
इसी मामले में 2026 में बेंगलुरु की एक अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी किया था। मामला कई मतदाता पहचान पत्रों से जुड़े आरोपों का है। जुलाई 2026 में प्रकाश राज अदालत में पेश हुए, जिसके बाद उन्हें सशर्त जमानत मिली।
यह पृष्ठभूमि मौजूदा घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला रही है। हालांकि पुराने मामले और मौजूदा SIR के दौरान कथित तौर पर नाम हटाए जाने के दावे को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जाना चाहिए।
मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
प्रकाश राज ने अपने वीडियो में जिस मुद्दे को उठाया, उसका व्यापक संबंध मतदाता सूची की विश्वसनीयता से है। किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज होना उसके मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा है। ऐसे में नाम हटने की स्थिति में संबंधित मतदाता के पास इसकी वजह जानने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपत्ति या दावा दर्ज कराने का अधिकार होता है।
मतदाता सूची में नामों को लेकर किसी भी तरह की त्रुटि होने पर संबंधित व्यक्ति को समय रहते उसे दुरुस्त कराने की प्रक्रिया अपनानी होती है। चुनावी व्यवस्था में इस तरह की प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र मतदाताओं के नाम सूची में बने रहें और अपात्र, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की गलत प्रविष्टियां हटाई जा सकें।
अब आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार
प्रकाश राज के दावे के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित चुनावी अधिकारी उनके नाम की मौजूदा स्थिति को लेकर क्या स्पष्टीकरण देते हैं। यदि नाम वास्तव में सूची से हटाया गया है तो उसका कारण क्या दर्ज किया गया है और क्या उसे दोबारा शामिल कराने के लिए प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, यह भी सामने आना बाकी है।
फिलहाल प्रकाश राज के बयान ने कर्नाटक में SIR और मतदाता सूची को लेकर चल रही बहस को नया मुद्दा दे दिया है। उनका सवाल सिर्फ उनके नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता सूची में किसी भी तरह के बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विश्वसनीय है, इस पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
आने वाले दिनों में चुनावी अधिकारियों की ओर से रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही यह तय होगा कि प्रकाश राज का नाम किस कारण से हटाया गया और क्या यह SIR प्रक्रिया के तहत हुआ या किसी अन्य प्रशासनिक कारण से। तब तक उनका दावा राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।





