
Karnataka कर्नाटक: प्रशासनिक और सहकारी संस्थानों में हालिया नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कार्यकाल में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए गए अधिकारियों को बदलकर उनकी जगह वोक्कालिगा समुदाय से जुड़े अधिकारियों को नियुक्त किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, कर्नाटक स्टेट कोऑपरेटिव एपेक्स बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर सीएन देवराज को पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह दिवाकर को नया प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया है। इसी तरह कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) में भी बदलाव किया गया है, जहां शिवस्वामी की जगह डॉ. एस.टी. सुरेश को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इन बदलावों के बीच राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि सहकारी और प्रशासनिक संस्थानों में नियुक्तियों को समुदाय आधारित संतुलन के बजाय राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बदला जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री पद की दौड़ और नेतृत्व की राजनीति के बीच वोक्कालिगा समुदाय की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी इन नियुक्तियों को देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में डीके शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले नेताओं की सक्रियता भी बढ़ी है।
बताया जा रहा है कि शिवकुमार के छोटे भाई और बेंगलुरु ग्रामीण के पूर्व सांसद डीके सुरेश कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, उनके बहनोई और MLC एस. रवि को एपेक्स बैंक के प्रमुख पद के लिए उम्मीदवार माना जा रहा है।
इन घटनाक्रमों के बाद कांग्रेस के भीतर असंतोष के संकेत भी सामने आ रहे हैं। खासकर गैर-वोक्कालिगा नेताओं के बीच यह नाराजगी देखी जा रही है कि कुछ वरिष्ठ पदों से हटाकर अन्य समुदाय के अधिकारियों को जगह दी जा रही है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यदि इस तरह की नियुक्तियों का रुझान जारी रहा, तो इससे संगठनात्मक संतुलन पर असर पड़ सकता है और पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ने की आशंका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम कर्नाटक की सत्ता राजनीति और समुदाय आधारित समीकरणों से जुड़ा हुआ है। डीके शिवकुमार को वोक्कालिगा समुदाय के एक प्रमुख नेता के रूप में देखा जाता है और वे राज्य में एक मजबूत नेतृत्व विकल्प के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए प्रशासनिक नियुक्तियों को विवाद से दूर रखे।
फिलहाल इस मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा लगातार तेज होती जा रही है।
कर्नाटक की सहकारी संस्थाएं राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, ऐसे में इन पदों पर होने वाले बदलावों का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव प्रशासनिक और आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पार्टी नेतृत्व इस विवाद को कैसे संभालता है और क्या इन नियुक्तियों को लेकर कोई संतुलनकारी कदम उठाया जाता है या नहीं।





