
कलबुर्गी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जातिगत भेदभाव और छुआछूत को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि समाज में जाति के आधार पर होने वाला भेदभाव और छुआछूत जैसी कुप्रथाएं हिंदू धर्म के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। खड़गे के अनुसार, यदि समाज में समानता और मानवीय सम्मान सुनिश्चित नहीं किया गया तो ऐसी प्रथाएं धर्म के अस्तित्व को भी प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए सामाजिक न्याय, समानता और भाईचारे की आवश्यकता पर जोर दिया।
खड़गे मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयदशमी के अवसर पर सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट की ओर से बुद्ध विहार में आयोजित 70वें धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे। कार्यक्रम में उन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर के सामाजिक संघर्ष, जाति व्यवस्था और बौद्ध धर्म अपनाने के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख किया।
जातिगत भेदभाव को लेकर खड़गे ने जताई चिंता
समारोह को संबोधित करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जातिगत भेदभाव और छुआछूत के कारण हिंदू धर्म के सामने गंभीर संकट खड़ा हो रहा है।
उनका कहना था कि जब किसी समाज में लोगों को जन्म और जाति के आधार पर ऊंचा या नीचा समझा जाता है, तब सामाजिक एकता कमजोर होती है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस समाज में सभी मनुष्यों को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता, वहां वास्तविक सामाजिक सद्भाव कैसे स्थापित हो सकता है।
खड़गे ने कहा कि जातिगत भेदभाव केवल किसी एक व्यक्ति या समुदाय की समस्या नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।
उनके इस बयान को धार्मिक मान्यताओं पर टिप्पणी के बजाय समाज में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं की आलोचना के संदर्भ में देखा जा रहा है।
डॉ. अंबेडकर के ऐतिहासिक बयान को किया याद
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने संबोधन में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के 1935 के ऐतिहासिक संकल्प का उल्लेख किया।
उन्होंने याद दिलाया कि बाबासाहेब अंबेडकर ने हिंदू समाज में जातिगत असमानता और छुआछूत का विरोध करते हुए घोषणा की थी कि उनका जन्म हिंदू परिवार में हुआ है, लेकिन वे हिंदू के रूप में मृत्यु स्वीकार नहीं करेंगे।
यह घोषणा अंबेडकर के सामाजिक और धार्मिक चिंतन का महत्वपूर्ण पड़ाव थी।
अंबेडकर का मानना था कि किसी भी समाज की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान मिले।
उन्होंने अपने जीवन में जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ अनेक आंदोलन चलाए और सामाजिक न्याय को सार्वजनिक जीवन का केंद्रीय विषय बनाया।
1956 में अपनाया था बौद्ध धर्म
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था।
इस ऐतिहासिक घटना को धम्म चक्र प्रवर्तन के रूप में याद किया जाता है।
अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को समानता, करुणा, तर्क और मानवीय गरिमा के मूल्यों से जुड़ा मार्ग माना था।
उनका धर्म परिवर्तन केवल व्यक्तिगत आस्था का निर्णय नहीं था, बल्कि जातिगत भेदभाव के खिलाफ लंबे सामाजिक संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा भी था।
धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस हर वर्ष इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है।
वर्ष 2026 में अंबेडकर के धर्म परिवर्तन की 70वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। बुद्ध विहार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 20 अक्टूबर को विशेष प्रार्थनाओं और दिनभर के कार्यक्रमों का आयोजन निर्धारित था।
सामाजिक समानता को बताया जरूरी
खड़गे ने सामाजिक जीवन में बराबरी के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि धर्म और समाज का उद्देश्य लोगों को एकजुट करना होना चाहिए।
उन्होंने जाति के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई।
कांग्रेस अध्यक्ष के अनुसार, संविधान ने सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया है। इसके बावजूद सामाजिक व्यवहार में छुआछूत और जातिगत भेदभाव जैसी समस्याओं का बने रहना गंभीर विषय है।
उन्होंने अंबेडकर के विचारों को याद करते हुए कहा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों की सोच और व्यवहार में भी बदलाव जरूरी है।
पहले भी छुआछूत का मुद्दा उठा चुके हैं खड़गे
मल्लिकार्जुन खड़गे इससे पहले भी सार्वजनिक जीवन में जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठा चुके हैं।
अगस्त 2026 में उत्तराखंड के हल्द्वानी में उनकी जनसभा के बाद उसी मैदान में कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम आयोजित किए जाने को लेकर विवाद हुआ था।
खड़गे ने आरोप लगाया था कि इस घटना से उन्हें छुआछूत और अपमान का अनुभव हुआ। उन्होंने राज्यसभा में भी इस मुद्दे को उठाया और संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
हालांकि, भाजपा नेता जेपी नड्डा ने उस समय कहा था कि भाजपा का इस आयोजन से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने घटना की जांच की बात भी कही थी।
संविधान में छुआछूत पर है प्रतिबंध
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है और किसी भी रूप में इसके व्यवहार को प्रतिबंधित करता है।
इसके अतिरिक्त नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 जैसे कानून भेदभाव तथा संबंधित अपराधों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है।
सामाजिक न्याय से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ शिक्षा और सामाजिक जागरूकता भी आवश्यक है।
धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस का विशेष महत्व
धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस बौद्ध अनुयायियों और अंबेडकर के विचारों को मानने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण अवसर है।
इस दिन अंबेडकर के जीवन, उनके सामाजिक आंदोलनों और समानता पर आधारित समाज के निर्माण के उनके संकल्प को याद किया जाता है।
विभिन्न स्थानों पर प्रार्थना सभाएं, विचार गोष्ठियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इन आयोजनों में सामाजिक न्याय, शिक्षा, मानवीय गरिमा और भाईचारे जैसे विषयों पर विशेष चर्चा होती है।
सामाजिक न्याय को लेकर फिर तेज हुई चर्चा
धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस पर मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान ने जातिगत भेदभाव, धार्मिक सुधार और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है।
खड़गे की टिप्पणी समाज में मौजूद छुआछूत और जातिगत असमानता की उनकी आलोचना को दर्शाती है। हालांकि, हिंदू धर्म के अस्तित्व को लेकर व्यक्त की गई आशंका उनकी राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी है, न कि किसी प्रमाणित भविष्यवाणी का निष्कर्ष।
भारत में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने भी समय-समय पर जातिगत भेदभाव के खिलाफ सुधार आंदोलनों में भूमिका निभाई है।
धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस के अवसर पर खड़गे ने डॉ. अंबेडकर के विचारों को याद करते हुए यह संदेश दिया कि सामाजिक समानता, मानवीय सम्मान और जातिगत भेदभाव का उन्मूलन एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है।





