
Karnataka कर्नाटक: बहुप्रतीक्षित दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगमन में इस वर्ष देरी दर्ज की गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) के अधिकारियों के अनुसार, मॉनसून की शुरुआत के लिए आवश्यक मौसमीय मानक इस बार निर्धारित क्राइटेरिया को पूरा नहीं कर पाए हैं, जिसके कारण इसकी प्रगति प्रभावित हुई है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा के पैटर्न में असामान्यता और बाहर जाने वाली लंबी-तरंग विकिरण (Outgoing Longwave Radiation) के संतुलन में गड़बड़ी के कारण मॉनसून की गति धीमी पड़ गई है। इसके अलावा लंबे समय तक जारी गर्म और शुष्क मौसम तथा प्री-मॉनसून बारिश के असमान पैटर्न ने भी मॉनसून की शुरुआत पर असर डाला है।
IMD-बेंगलुरु के निदेशक-इन-चार्ज एन. पुवियारासन ने बताया कि मॉनसून के सामान्य विकास के लिए पश्चिमी हवाओं का लगभग 4 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचना जरूरी होता है, लेकिन वर्तमान में यह स्तर केवल लगभग 1.5 किलोमीटर तक ही सीमित है। इस कारण नमी और हवाओं का आवश्यक संतुलन नहीं बन पा रहा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केरल में इस समय जो बारिश हो रही है, वह वास्तविक मॉनसून बारिश नहीं है, बल्कि प्री-मॉनसून वर्षा है। मौसम विभाग के अनुसार, लंबे समय के औसत आंकड़ों के आधार पर मॉनसून के आगमन की सामान्य तिथि 1 जून मानी जाती है, लेकिन इस वर्ष इसके 26-27 मई तक पहुंचने की उम्मीद जताई गई थी, जो अब पूरी नहीं हो सकी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून के व्यवहार में यह बदलाव जलवायु परिस्थितियों और वायुमंडलीय असंतुलन का संकेत हो सकता है। हवा की दिशा, समुद्री तापमान और वायुमंडलीय दबाव जैसे कारक मॉनसून की गति और समय को सीधे प्रभावित करते हैं।
मौसम विभाग लगातार इन सभी कारकों पर नजर बनाए हुए है और स्थिति के सामान्य होने के बाद मॉनसून के आगे बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल, विभिन्न क्षेत्रों में गर्मी का असर बना हुआ है, जिससे लोगों को राहत का इंतजार और बढ़ गया है।
कुल मिलाकर, इस वर्ष मॉनसून की देरी ने कृषि और मौसम आधारित गतिविधियों पर भी प्रभाव डालने की आशंका बढ़ा दी है, और अब सभी की नजरें इसके आगे के विकास पर टिकी हुई हैं।





