
Karnataka कर्नाटक: कुंदापुर तालुक के वाकवाड़ी गांव में एक दुर्लभ वीरगल्लू (हीरो स्टोन) की खोज हुई है, जिसे तुलुनाडु के पुरातात्विक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। यह पत्थर क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति, युद्ध परंपराओं और सामाजिक जीवन को समझने में अहम भूमिका निभा सकता है।
हालांकि दक्षिण भारत और कर्नाटक में वीरगल्लू पत्थर सामान्य रूप से पाए जाते हैं, लेकिन तुलु क्षेत्र में इनकी उपस्थिति बेहद दुर्लभ है। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, यह अब तक इस क्षेत्र में मिला केवल दूसरा वीरगल्लू शिलालेख है। इससे पहले ऐसा ही एक शिलालेख हेबरी तालुक के सोमेश्वर क्षेत्र में पाया गया था।
इस खोज को आर्कियोलॉजिस्ट प्रो. टी. मुरुगेशी की टीम “आदिमा कला ट्रस्ट” ने अंजाम दिया है। उन्होंने बताया कि यह पत्थर तुलुनाडु की प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह वीरगल्लू लगभग 45 इंच लंबा और 22.5 इंच चौड़ा है। चौकोर आकार के इस शिलालेख पर तीन अलग-अलग स्तरों पर नक्काशी की गई है, जो इसे और भी विशेष बनाती है।
पत्थर के निचले हिस्से में दो योद्धाओं को शिकार करते हुए दिखाया गया है, जिनमें वे शिकार के कुत्तों को पकड़ते नजर आते हैं। यह दृश्य उस समय की शिकार परंपराओं और युद्ध कौशल को दर्शाता है।
बीच के हिस्से में दो योद्धाओं का दृश्य उकेरा गया है, जिनमें एक धनुष लिए हुए है और दूसरा तीर संभाले हुए है। दोनों एक हिरण की गर्दन पर निशाना साधते दिखाए गए हैं, जो उस समय की सैन्य और शिकार संस्कृति का संकेत देता है।
सबसे ऊपरी हिस्से में लिंग के दोनों ओर योद्धाओं को प्रणाम की मुद्रा में बैठे हुए दर्शाया गया है। इसके ऊपर द्रविड़ शैली की संरचना जैसी आकृति भी उकेरी गई है, जो उस काल की धार्मिक और स्थापत्य कला को दर्शाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वीरगल्लू न केवल एक शिलालेख है, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था, युद्ध परंपरा और धार्मिक आस्था का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह खोज तुलुनाडु के इतिहास को और अधिक समृद्ध बनाती है।
पुरातत्वविदों ने कहा है कि इस तरह की खोजें क्षेत्र के अतीत को समझने में मदद करती हैं और भविष्य में और भी ऐतिहासिक साक्ष्यों के मिलने की संभावना बढ़ाती हैं।
स्थानीय लोगों ने भी इस खोज पर खुशी जताई है और इसे अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के लिए गर्व का विषय बताया है।
कुल मिलाकर, वाकवाड़ी गांव में मिला यह दुर्लभ वीरगल्लू तुलुनाडु के ऐतिहासिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है और दक्षिण भारत की प्राचीन विरासत को नई रोशनी में प्रस्तुत करता है।





