कर्नाटक

शराब बिक्री रोकने के फैसले पर HC ने जताई नाराजगी

Ratna Netam
11 Sept 2026 3:31 PM IST
शराब बिक्री रोकने के फैसले पर HC ने जताई नाराजगी
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बेंगलुरु। गणेश उत्सव के दौरान शराब की बिक्री पर लंबे समय तक रोक लगाने के आदेश को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर पूरे गणेश उत्सव के दौरान कई दिनों तक शराब की दुकानों को बंद रखने का औचित्य क्या है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में यहां तक टिप्पणी कर दी कि अगर किसी को 10 दिनों तक शराब नहीं मिलेगी तो वह 'बीमार हो जाएगा'। अदालत की इस टिप्पणी के बाद मामला चर्चा में आ गया है।
विवाद स्थानीय प्रशासन की ओर से गणेश उत्सव के दौरान शराब की बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंध से जुड़ा है। आदेश के तहत त्योहार और गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से शराब की दुकानों को कई दिनों तक बंद रखने की बात कही गई थी।
इस आदेश को शराब कारोबारियों ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि पूरे उत्सव के दौरान लगातार शराब की बिक्री बंद रखना जरूरत से ज्यादा कठोर फैसला है और इससे लाइसेंस प्राप्त कारोबारियों को भारी आर्थिक नुकसान होगा।
हाईकोर्ट ने पूछा- इतने दिनों की रोक क्यों?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन से यह जानना चाहा कि शराब की बिक्री पर इतने लंबे समय के लिए रोक लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
आमतौर पर चुनाव, महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन, जुलूस या कानून-व्यवस्था की संवेदनशील परिस्थितियों में प्रशासन 'ड्राई डे' घोषित कर सकता है। लेकिन अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या पूरे त्योहार के दौरान लगातार कई दिनों तक शराब की बिक्री बंद रखना आवश्यक और आनुपातिक कदम है।
अदालत ने प्रशासन से प्रतिबंध का स्पष्ट आधार बताने को कहा। कोर्ट ने संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके नाम पर किसी वैध कारोबार पर जरूरत से ज्यादा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
10 दिन में तो बीमार हो जाएंगे'
सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा जज की उस टिप्पणी की हो रही है जिसमें लंबे समय तक शराब नहीं मिलने को लेकर मजाकिया अंदाज में बात कही गई।
कोर्ट ने सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से शराब पीता है और उसे 10 दिनों तक शराब नहीं मिले तो वह बीमार पड़ सकता है। इस टिप्पणी को शराब सेवन को प्रोत्साहित करने के रूप में नहीं बल्कि प्रशासन की ओर से लगाए गए लंबे प्रतिबंध की व्यावहारिकता पर सवाल के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
अदालतों में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश कई बार मौखिक टिप्पणियां करते हैं। ऐसी मौखिक टिप्पणियों और अदालत के लिखित आदेश के बीच अंतर होता है। मामले में कानूनी रूप से वही प्रभावी होगा जो हाईकोर्ट के औपचारिक आदेश में दर्ज किया गया है।
शराब कारोबारियों ने दी थी चुनौती
शराब विक्रेताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि उनके पास वैध लाइसेंस हैं और वे सरकार को विभिन्न शुल्क और टैक्स का भुगतान करते हैं। इसके बावजूद यदि उन्हें लंबे समय तक दुकानें बंद रखने का आदेश दिया जाता है तो आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
कारोबारियों का कहना था कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए किसी विशेष दिन या कुछ घंटों के लिए शराब की बिक्री रोकी जा सकती है, लेकिन पूरे उत्सव की अवधि के लिए प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने प्रशासन के आदेश को अनुपातहीन बताते हुए अदालत से राहत मांगी।
प्रशासन ने क्यों लगाया प्रतिबंध?
गणेश उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में धार्मिक कार्यक्रम और जुलूस आयोजित किए जाते हैं। गणेश प्रतिमाओं की स्थापना से लेकर विसर्जन तक विभिन्न इलाकों में भारी भीड़ रहती है।
प्रशासन अक्सर ऐसे अवसरों पर शराब की बिक्री को कानून-व्यवस्था से जोड़कर देखता है। आशंका रहती है कि नशे की स्थिति में विवाद, मारपीट या जुलूस के दौरान अप्रिय घटनाओं की संभावना बढ़ सकती है।
इसी वजह से संवेदनशील क्षेत्रों में शराब की दुकानों को बंद रखने के आदेश दिए जाते हैं। कई राज्यों में धार्मिक जुलूस, मतदान या बड़े सार्वजनिक आयोजनों के दौरान सीमित अवधि के लिए शराब की बिक्री प्रतिबंधित करना सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था है।
लेकिन मौजूदा मामले में विवाद प्रतिबंध की लंबी अवधि को लेकर पैदा हुआ।
कानून-व्यवस्था बनाम कारोबार का अधिकार
हाईकोर्ट के सामने इस मामले में दो पहलुओं के बीच संतुलन का सवाल है। एक तरफ राज्य और स्थानीय प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी है। दूसरी ओर लाइसेंस लेकर कारोबार करने वाले दुकानदारों के हित भी हैं।
शराब का कारोबार सामान्य व्यापार की तरह पूर्ण मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं माना जाता और राज्य को इस क्षेत्र में व्यापक नियामक अधिकार प्राप्त हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक निर्णय मनमाने नहीं हो सकते और उन्हें संबंधित कानून तथा नियमों के अनुरूप होना जरूरी है।
यही कारण है कि अदालत प्रशासन से यह जानना चाहती है कि प्रतिबंध कितने समय के लिए आवश्यक था और क्या कम कठोर विकल्प उपलब्ध थे।
गणेश उत्सव में सुरक्षा बड़ी चुनौती
गणेश उत्सव दक्षिण भारत के कई राज्यों में बड़े स्तर पर मनाया जाता है। कर्नाटक में भी बेंगलुरु समेत विभिन्न शहरों और कस्बों में हजारों गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।
विसर्जन के दिन बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर निकलते हैं। जुलूसों के कारण ट्रैफिक डायवर्जन करना पड़ता है और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाता है।
ऐसे आयोजनों में प्रशासन के लिए भीड़ नियंत्रण के साथ अलग-अलग समुदायों के बीच शांति बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होता है।
इसी कारण कई जगहों पर विसर्जन वाले दिन शराब की दुकानों को बंद रखने का फैसला किया जाता है। लेकिन हाईकोर्ट में चुनौती पूरे उत्सव या असामान्य रूप से लंबी अवधि की बंदी को लेकर है।
ड्राई डे पर क्या है व्यवस्था?
भारत में शराब की बिक्री राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है। अलग-अलग राज्यों में आबकारी कानून और नियम अलग हो सकते हैं।
राष्ट्रीय पर्वों, चुनाव और राज्य सरकार द्वारा घोषित विशेष अवसरों पर ड्राई डे रखा जाता है। इसके अलावा जिला प्रशासन को भी कुछ परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था को देखते हुए शराब की बिक्री सीमित करने की शक्ति दी जा सकती है।
हालांकि किसी स्थानीय आदेश को अदालत में चुनौती दिए जाने पर यह जांच की जा सकती है कि फैसला सक्षम प्राधिकारी ने लिया था या नहीं और उसके पीछे पर्याप्त कानूनी तथा तथ्यात्मक आधार था या नहीं।
सोशल मीडिया पर छाई जज की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हुई '10 दिनों में बीमार हो जाएंगे' वाली टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गई। कई लोगों ने इसे मजाकिया अंदाज में साझा किया, जबकि कुछ लोगों ने इस पर सवाल भी उठाए।
लेकिन अदालत की टिप्पणी को उसके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है। सुनवाई का मुख्य मुद्दा शराब पीना सही या गलत है, यह तय करना नहीं था। असली विवाद यह था कि प्रशासन द्वारा लगातार कई दिनों तक शराब की बिक्री पर रोक लगाना कानून और परिस्थितियों के लिहाज से उचित है या नहीं।
इसके अलावा न्यायाधीश की मौखिक टिप्पणी को अदालत का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
स्वास्थ्य के लिहाज से भी अहम है टिप्पणी का संदर्भ
लंबे समय से अत्यधिक मात्रा में शराब पीने वाले कुछ लोगों में अचानक शराब बंद करने पर 'अल्कोहल विदड्रॉल' की समस्या हो सकती है। गंभीर निर्भरता वाले व्यक्ति में कंपकंपी, बेचैनी और अन्य लक्षण सामने आ सकते हैं तथा कुछ मामलों में चिकित्सकीय देखरेख जरूरी होती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि शराब पीते रहना स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन शराब सेवन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर चेतावनी देता है। इसलिए अदालत में हुई टिप्पणी को शराब सेवन के स्वास्थ्य लाभ के दावे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आगे क्या होगा?
मामले में अब सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हाईकोर्ट का लिखित आदेश और प्रशासन की ओर से पेश किया गया कानूनी आधार होगा। अदालत यह देख सकती है कि क्या पूरे उत्सव के लिए प्रतिबंध जरूरी था या इसे केवल जुलूस और विसर्जन के महत्वपूर्ण दिनों तक सीमित किया जा सकता था।
यदि कोर्ट को लगता है कि प्रतिबंध जरूरत से ज्यादा व्यापक है तो उसमें राहत या बदलाव किया जा सकता है। वहीं प्रशासन पर्याप्त आधार पेश करता है तो कानून-व्यवस्था से जुड़ी पाबंदियों को बरकरार भी रखा जा सकता है।
कुल मिलाकर गणेश उत्सव के दौरान शराब की बिक्री पर लंबे प्रतिबंध का मामला अब केवल आबकारी विभाग का प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया है। हाईकोर्ट में पहुंचने के बाद प्रतिबंध की अवधि, उसका औचित्य और कारोबारियों के हित सभी कानूनी जांच के दायरे में आ गए हैं।
सुनवाई के दौरान जज की '10 दिनों में तो बीमार हो जाएंगे' वाली टिप्पणी ने भले ही सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हों, लेकिन मामले का असली सवाल यही है कि धार्मिक उत्सव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए शराब बिक्री पर कितनी अवधि तक रोक लगाना उचित और कानूनी रूप से आनुपातिक है।
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