
x
बेंगलुरु। कर्नाटक में भीषण सूखे के कारण किसानों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। राज्य के कई जिलों में फसलें बर्बाद हो गई हैं और कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस गंभीर स्थिति के बीच उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने गुरुवार को किसानों को हरसंभव सहायता देने का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि किसानों की आजीविका की रक्षा करना राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता है। इसके लिए यदि सरकार को कर्ज भी लेना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने बताया कि राज्य के कुल 240 तालुकों में से 217 को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है, जबकि अन्य क्षेत्रों में नुकसान का आकलन जारी है।
उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने प्रभावित कृषि क्षेत्रों का दौरा कर फसलों को हुए नुकसान की जानकारी ली और किसानों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि राज्य इस समय गंभीर प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा है। खेतों में खड़ी फसलें नष्ट होने से किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। राज्य सरकार प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने और कृषि क्षेत्र को इस संकट से निकालने के लिए विभिन्न उपाय कर रही है।गुरुवार को कोप्पल जिले के येलबुर्गा तालुक के गुन्नाल गांव में कृषि भूमि का निरीक्षण करने के बाद परमेश्वर ने कहा कि सरकार किसानों की सहायता के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था करेगी। उन्होंने कहा कि किसानों को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा और उनकी आजीविका बचाने के लिए सभी संभव कदम उठाए जाएंगे।
उपमुख्यमंत्री के अनुसार, कर्नाटक के 240 तालुकों में से 217 पहले ही सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं। शेष 23 तालुकों में जमीनी स्तर पर स्थिति का सत्यापन किया जा रहा है। इनमें से लगभग 10 से 15 अतिरिक्त तालुकों को भी सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की संभावना है। इससे स्पष्ट होता है कि सूखे का प्रभाव राज्य के अधिकांश हिस्सों तक पहुंच चुका है।राज्य के उत्तरी जिलों में स्थिति अधिक गंभीर बताई जा रही है। बल्लारी, विजयनगर, कोप्पल, रायचूर और विजयपुरा जैसे जिलों में कृषि गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इन क्षेत्रों में सूखे का असर मैसूर क्षेत्र की तुलना में ज्यादा गंभीर है।उन्होंने बताया कि विजयनगर जिले में किए गए आकलन के दौरान लगभग 98 प्रतिशत फसलों के नष्ट होने की बात सामने आई है। शेष फसलों से भी किसानों को उपयोगी पैदावार मिलने की संभावना बेहद कम बताई गई है। यह स्थिति राज्य में कृषि संकट की गंभीरता को दर्शाती है।
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की सुरक्षा और उनकी आजीविका को बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। फसल खराब होने के बाद किसानों के सामने न केवल आर्थिक संकट खड़ा होता है, बल्कि आगामी खेती के लिए संसाधन जुटाना भी कठिन हो जाता है। ऐसे में सरकार का प्रयास प्रभावित किसानों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराना है।कर्नाटक सरकार ने सूखा प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए पहली किस्त के रूप में 1,250 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसके तहत लगभग 50 लाख किसानों को प्रति किसान 2,500 रुपये की प्रारंभिक सहायता देने की व्यवस्था की गई है। उपमुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि यह राशि किसानों को हुए वास्तविक नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में प्रभावित किसानों को राहत देना भी सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
परमेश्वर ने बताया कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष यानी एनडीआरएफ के निर्धारित मानदंडों के अनुसार राहत सहायता में केंद्र और राज्य सरकार की हिस्सेदारी शामिल होती है। राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र से सहायता मिलने की प्रतीक्षा किए बिना उसने अपने संसाधनों से शुरुआती राहत राशि जारी करने का फैसला किया है।राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के समक्ष भी सूखे से हुए नुकसान का विवरण प्रस्तुत किया है। प्रारंभिक आकलन के आधार पर कृषि क्षेत्र में लगभग 46 हजार करोड़ रुपये का नुकसान बताया गया है। इसके साथ ही राज्य ने केंद्र सरकार से लगभग 10 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये तक की राहत सहायता की मांग की है।
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि नुकसान का अंतिम आकलन बढ़ सकता है। यदि कुल नुकसान लगभग 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचता है, तो राज्य सरकार केंद्र से अधिक राहत राशि की मांग कर सकती है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे इस संकट के समय किसानों की सहायता के लिए मिलकर प्रयास करें।सूखे के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का संकट भी गहराने की आशंका है। उपमुख्यमंत्री ने बताया कि कुछ इलाकों में ग्रामीण परिवार काम की तलाश में दूसरे स्थानों पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत प्रभावित लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराया जाए।
उन्होंने कहा कि यदि गांवों में पर्याप्त रोजगार मिलेगा, तो लोगों को आजीविका की तलाश में पलायन करने की आवश्यकता कम होगी। सरकार पेयजल आपूर्ति, किसानों की आर्थिक सहायता और रोजगार उपलब्ध कराने को सूखा प्रबंधन की प्राथमिकताओं में शामिल कर रही है।राज्य के कई इलाकों में भूजल स्तर गिरने की समस्या भी सामने आई है। उपमुख्यमंत्री के अनुसार, कुछ स्थानों पर सैकड़ों फीट गहराई तक बोरवेल खोदने के बावजूद पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है। इससे कृषि गतिविधियों के साथ पेयजल व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ रहा है।कर्नाटक सरकार सूखा प्रभावित किसानों को ऋण चुकाने में राहत देने के उपाय भी कर रही है। राज्य ने प्रभावित किसानों के कृषि ऋण की वसूली स्थगित करने और ऋण पुनर्गठन से जुड़े कदम उठाने के लिए बैंकों को निर्देश दिए हैं। इसके अलावा निजी माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं द्वारा कर्ज वसूली के नाम पर किसानों को परेशान किए जाने के मामलों में कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
सरकार फसल बीमा से संबंधित भुगतान में तेजी लाने के उपायों की भी समीक्षा कर रही है। इसका उद्देश्य प्रभावित किसानों तक राहत पहुंचाना और फसल नुकसान के कारण पैदा हुए आर्थिक दबाव को कम करना है।उपमुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में दी जा रही सहायता पर्याप्त नहीं होने की स्थिति में सरकार अतिरिक्त कदम उठाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों की मदद के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी को बाधा नहीं बनने दिया जाएगा। जरूरत पड़ने पर राज्य सरकार कर्ज लेकर भी राहत उपलब्ध कराने को तैयार है।
परमेश्वर ने कहा कि राज्य की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समाज में किसानों का महत्वपूर्ण योगदान है। कृषि क्षेत्र के संकट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे ग्रामीण रोजगार, स्थानीय व्यापार और अन्य आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।कर्नाटक में लगातार बढ़ते सूखे के बीच सरकार के सामने फसल नुकसान की भरपाई, पेयजल उपलब्धता और ग्रामीण रोजगार सुनिश्चित करने जैसी चुनौतियां हैं। फिलहाल 217 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है और अन्य प्रभावित क्षेत्रों का आकलन जारी है।उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि राज्य सरकार इस कठिन समय में उनके साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि किसानों के हितों की रक्षा और उनकी आजीविका को सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिकता बनी रहेगी। इसके लिए राज्य सरकार अपने संसाधनों का उपयोग करने के साथ केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्राप्त करने का भी प्रयास करेगी।
Next Story





