
Karnataka कर्नाटक: हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत लगातार बढ़ते जा रहे हैं। बर्फ से ढके इस ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र में नदियों और झरनों के जलस्तर में गिरावट ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर सिंधु नदी समेत कई प्रमुख जलस्रोतों में पानी की कमी अब एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रही है।
हिमालय क्षेत्र में काम कर रहे ग्लेशियोलॉजिस्ट और पर्यावरण विशेषज्ञों ने बताया कि पिछले कई वर्षों से नदियों के जलस्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इस साल यह स्थिति और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इसका सीधा असर न केवल स्थानीय समुदायों पर पड़ रहा है, बल्कि निचले इलाकों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार रहने वाले लोगों की जल आवश्यकताओं पर भी प्रभाव पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों से निकलने वाले जल स्रोतों में लगातार कमी आने से आने वाले समय में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नदियों का प्रवाह कमजोर होने से कृषि, पेयजल और पारिस्थितिकी तंत्र पर भी असर पड़ रहा है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के डिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के सीनियर ग्लेशियोलॉजिस्ट और स्पेशल साइंटिस्ट प्रोफेसर अनिल कुलकर्णी ने इस स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि हिमालय में बर्फ के जमाव और जल स्तर में गिरावट कई कारणों का परिणाम है, जिसमें सबसे प्रमुख कारण मानव गतिविधियों का बढ़ना है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ का जमाव सामान्य से कम रहा है। इसके साथ ही तापमान में असामान्य वृद्धि भी देखी गई है, और कुछ क्षेत्रों में तो ऊंचाई पर तापमान मैदानी इलाकों से भी अधिक दर्ज किया गया है, जो एक असामान्य और चिंताजनक संकेत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले एक दशक से यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी तीव्रता और प्रभाव अधिक दिखाई देने लगे हैं। इससे ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ रही है और भविष्य में जल संसाधनों पर बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है।
पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि यदि इसी तरह मानव गतिविधियां, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जारी रहा, तो हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
कुल मिलाकर, हिमालय में घटता जल स्तर और बर्फ का कम होता जमाव एक बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा कर रहा है, जिसके समाधान के लिए तत्काल और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता बताई जा रही है।





