
बेंगलुरु। बिदादी टाउनशिप परियोजना को लेकर विवाद और गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस वी. गोपाला गौड़ा की अध्यक्षता वाली एक स्वतंत्र समिति ने कर्नाटक सरकार के उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत ‘ग्रेटर बैंगलोर डेवलपमेंट अथॉरिटी’ (GBDA) के जरिए प्रस्तावित टाउनशिप परियोजना को आगे बढ़ाने की योजना बनाई गई है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार के इस फैसले को ‘असंवैधानिक’ करार दिया है।
समिति के अनुसार, GBDA को कर्नाटक अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (KUDA) एक्ट की धारा 3 के तहत गठित वैधानिक अथॉरिटी नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी क्षेत्र में KUDA एक्ट के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह जरूरी है कि संबंधित क्षेत्र कानून में निर्धारित ‘शहरी क्षेत्र’ की श्रेणी में आता हो। समिति के मुताबिक, बिदादी टाउनशिप परियोजना के लिए जिन जमीनों को अधिग्रहण के दायरे में लाया जा रहा है, वे ग्राम पंचायतों की सीमाओं में आती हैं।
भूमि अधिग्रहण की वैधानिकता पर सवाल
समिति की रिपोर्ट में बिदादी टाउनशिप परियोजना के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, KUDA एक्ट की धारा 2(s) के तहत जिस इलाके को ‘शहरी क्षेत्र’ माना जाता है, उसी आधार पर संबंधित प्राधिकरण को भूमि अधिग्रहण की शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं।
लेकिन समिति ने कहा है कि परियोजना के लिए चुनी गई जमीनें ग्राम पंचायत क्षेत्रों में स्थित हैं। ऐसे में इन जमीनों को शहरी क्षेत्र मानकर KUDA एक्ट के प्रावधानों के तहत अधिग्रहण करना कानूनी सवाल खड़े करता है।
समिति ने इस आधार पर GBDA की भूमिका और उसके जरिए परियोजना को लागू करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किसी भी विकास परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण करते समय संबंधित कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का पालन जरूरी है।
ग्रामीण जमीन को शहरी परियोजना में शामिल करने पर आपत्ति
बिदादी टाउनशिप परियोजना के तहत बड़ी मात्रा में जमीन को विकास के लिए इस्तेमाल करने की योजना है। समिति का कहना है कि जिन क्षेत्रों की जमीन प्रस्तावित परियोजना में शामिल की गई है, वे वर्तमान में ग्रामीण प्रशासनिक सीमाओं के भीतर आती हैं।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि केवल किसी क्षेत्र को बड़े शहरी विकास के दायरे में लाने की योजना बना देने से वह क्षेत्र स्वतः कानूनी रूप से ‘शहरी क्षेत्र’ नहीं बन जाता। इसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
यही बिंदु समिति की रिपोर्ट का एक प्रमुख आधार है। समिति के अनुसार, भूमि अधिग्रहण की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित जमीन और क्षेत्र पर लागू कानून क्या कहता है और क्या उस कानून के तहत संबंधित प्राधिकरण को अधिग्रहण का अधिकार प्राप्त है।
उपजाऊ और सिंचित जमीन पर भी चिंता
रिपोर्ट में केवल कानूनी पहलू ही नहीं, बल्कि परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। समिति ने बताया कि अधिग्रहण के लिए चुनी गई जमीनों का एक बड़ा हिस्सा उपजाऊ और सिंचित है।
इन जमीनों पर स्थानीय लोग विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियां करते हैं। इनमें पशुपालन और दूध उत्पादन, रेशम पालन, बागवानी तथा सब्जियों की खेती प्रमुख हैं।
समिति के मुताबिक, ऐसी जमीन केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होती, बल्कि इससे स्थानीय परिवारों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण जुड़ा होता है। इसलिए किसी बड़े टाउनशिप प्रोजेक्ट के लिए इन जमीनों का अधिग्रहण करते समय सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत आकलन किया जाना चाहिए।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियां ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवारों की आय का आधार होती हैं। यदि उपजाऊ कृषि भूमि को बड़े निर्माण प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित किया जाता है, तो इसका असर केवल जमीन के मालिकों तक सीमित नहीं रहता।
पशुपालन, दूध उत्पादन, रेशम पालन और बागवानी जैसी गतिविधियों से जुड़े लोगों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। स्थानीय बाजार, रोजगार और आपूर्ति श्रृंखला भी इससे प्रभावित हो सकती है।
समिति ने इसी व्यापक प्रभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा है कि परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी सवाल
उपजाऊ और सिंचित जमीन के बड़े पैमाने पर विकास में इस्तेमाल होने से प्राकृतिक संसाधनों पर भी दबाव पड़ सकता है। कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव से जल संसाधनों, स्थानीय जैव विविधता और ग्रामीण पर्यावरण पर असर पड़ने की संभावना रहती है।
समिति ने रिपोर्ट में इन पहलुओं को भी महत्व दिया है। उसका कहना है कि परियोजना की योजना बनाते समय केवल शहरी विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास को ध्यान में रखना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय पर्यावरण और समुदायों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का भी मूल्यांकन जरूरी है।
GBDA की कानूनी स्थिति पर बहस
बिदादी परियोजना में GBDA की भूमिका रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। समिति ने कहा है कि GBDA को KUDA एक्ट की धारा 3 के तहत गठित अथॉरिटी नहीं माना जा सकता।
इसका सीधा संबंध इस सवाल से है कि क्या GBDA के जरिए उस क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण और टाउनशिप विकास की प्रक्रिया को वैधानिक अधिकार प्राप्त है। समिति की आपत्ति के मुताबिक, यदि संबंधित क्षेत्र KUDA एक्ट में परिभाषित ‘शहरी क्षेत्र’ के दायरे में नहीं आता, तो उस कानून के तहत अधिग्रहण की शक्ति का इस्तेमाल सवालों के घेरे में आ सकता है।
सरकार के सामने बढ़ी चुनौती
समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद कर्नाटक सरकार के सामने परियोजना को लेकर कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चुनौती बढ़ सकती है। सरकार को अब परियोजना के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण और GBDA की भूमिका से जुड़े सवालों पर जवाब देना पड़ सकता है।
वहीं, प्रभावित ग्रामीणों और किसानों के लिए यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, क्योंकि इसमें जमीन की कानूनी स्थिति के साथ-साथ उनकी आजीविका और पर्यावरणीय चिंताओं को भी दर्ज किया गया है।
विकास और ग्रामीण हितों के बीच संतुलन की जरूरत
बिदादी टाउनशिप परियोजना का विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है—शहरी विस्तार और ग्रामीण हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। बेंगलुरु महानगर क्षेत्र के विस्तार के साथ नए आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों की जरूरत बढ़ रही है। लेकिन इसके लिए कृषि भूमि और ग्रामीण क्षेत्रों का इस्तेमाल करते समय स्थानीय समुदायों की सहमति, कानूनी प्रक्रिया और पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस वी. गोपाला गौड़ा की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसी तरह के सवालों पर जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के लिए प्रस्तावित जमीनें न केवल कानूनी स्थिति के लिहाज से विवादित हैं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
अब यह देखना अहम होगा कि कर्नाटक सरकार समिति की रिपोर्ट में उठाए गए संवैधानिक, कानूनी, सामाजिक और पर्यावरणीय सवालों पर क्या रुख अपनाती है और बिदादी टाउनशिप परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाती है।





