कर्नाटक

कर्नाटक में SIR के बाद 1 करोड़ नाम हटने का दावा

Rajeshwari Nishad
27 Oct 2026 2:38 PM IST
कर्नाटक में SIR के बाद 1 करोड़ नाम हटने का दावा
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बेंगलुरु। कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है। लंबे समय तक चली राजनीतिक खींचतान और विवादों के बीच संपन्न हुई इस प्रक्रिया में करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो गए हैं। सामने आए आंकड़ों के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में अब लगभग 4.55 करोड़ मतदाता रह गए हैं। इस बड़े बदलाव ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ चुनाव आयोग मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने को लेकर राजनीतिक दलों ने चिंता जताई है।
अंतिम वोटर लिस्ट में 4.55 करोड़ मतदाता
कर्नाटक में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले कुल 5,54,32,314 मतदाता पंजीकृत थे। पुनरीक्षण के बाद अंतिम सूची में करीब 4.55 करोड़ मतदाताओं के नाम होने की जानकारी सामने आई है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में 4,55,00,011 मतदाता दर्ज हैं। हालांकि, इस सटीक संख्या की आधिकारिक अंतिम आंकड़ा-पत्र से स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।अगर इस आंकड़े को आधार माना जाए तो पहले की सूची के मुकाबले कुल 99,32,303 मतदाताओं की कमी हुई है। यानी करीब 17.9 प्रतिशत नाम मतदाता सूची से बाहर हुए हैं।इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना राज्य की चुनावी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जून में शुरू हुई थी एसआईआर की प्रक्रिया
कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जून 2026 में शुरू की गई थी। निर्वाचन आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं की पहचान करना था।
इसके तहत बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन किया।24 अगस्त 2026 को प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची में 4,46,80,151 मतदाताओं के नाम दर्ज थे। इसके बाद लोगों को नाम जोड़ने, संशोधन कराने और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका दिया गया।दावे और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 22 अक्टूबर तक चली। इसके बाद अंतिम सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित करने का कार्यक्रम तय किया गया था।
किन कारणों से हटाए गए मतदाताओं के नाम?
एसआईआर के दौरान मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, दोहरी प्रविष्टि और अन्य श्रेणियों में चिह्नित किया गया।प्रारूप सूची तैयार करते समय लगभग 1.08 करोड़ मतदाताओं के नाम शामिल नहीं किए गए थे। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो अपने पंजीकृत पते पर नहीं मिले या किसी दूसरे स्थान पर रहने चले गए थे।इसके अलावा मृत मतदाताओं, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत लोगों और आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराने वाले मतदाताओं के नामों की भी जांच की गई।
हालांकि, किसी मतदाता का सत्यापन के दौरान अनुपस्थित मिलना अपने आप में उसके मतदान के लिए अयोग्य होने का प्रमाण नहीं है। ऐसे लोगों को दस्तावेजों के साथ अपना नाम दोबारा जुड़वाने का अवसर दिया गया।
43 लाख से अधिक मतदाताओं को जारी हुए नोटिस
पुनरीक्षण के दौरान चुनाव आयोग ने 43,82,824 मतदाताओं को नोटिस जारी किए थे।ये नोटिस मुख्य रूप से उन लोगों को भेजे गए, जिनकी जानकारी पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रही थी या जिनके दस्तावेजों में विसंगतियां सामने आई थीं।कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबक्कुमार के कार्यालय के अनुसार, इन नोटिसों पर सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी।अधिकारियों का कहना था कि पात्र मतदाताओं को अपनी पहचान और निवास से संबंधित जानकारी प्रस्तुत करने के पर्याप्त अवसर दिए गए।
नाम जोड़ने और हटाने के लिए लाखों आवेदन
एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग को बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त हुए।16 जून से 22 अक्टूबर के बीच कुल 25,87,461 आवेदन जमा किए गए। इनमें 10,42,863 आवेदन फॉर्म-6 के माध्यम से नए नाम जोड़ने के लिए प्राप्त हुए।वहीं, फॉर्म-7 के तहत 2,28,917 आवेदन नाम हटाने या मतदाता सूची में दर्ज नामों पर आपत्ति जताने के लिए जमा किए गए।इसके अलावा फॉर्म-8 के माध्यम से 13,10,841 आवेदन नाम, पता और अन्य जानकारियों में संशोधन के लिए प्राप्त हुए।फॉर्म-6ए के तहत विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिकों से भी 4,840 आवेदन प्राप्त हुए थे।
कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक घमासान
कर्नाटक में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से ही सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा।कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बड़े पैमाने पर आपत्तियां दर्ज कराई गईं और इस प्रक्रिया का राजनीतिक इस्तेमाल करने की कोशिश हुई।दूसरी तरफ भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया और मतदाता सूची में गड़बड़ियों को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।फॉर्म-7 के बड़ी संख्या में आवेदन मिलने के बाद कुछ मामलों में जांच और पुलिस कार्रवाई की खबरें भी सामने आई थीं।हालांकि, राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, यह मान लेना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले की जांच जरूरी है।
वोटर लिस्ट से नाम हट गया तो क्या करें?
चुनाव आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद भी पात्र नागरिकों के लिए नाम जुड़वाने और विवरण में सुधार कराने की प्रक्रिया जारी रहती है।जिन मतदाताओं का नाम सूची में नहीं है, वे फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।मतदाता निर्वाचन आयोग के वोटर्स पोर्टल पर जाकर अपना नाम खोज सकते हैं और संबंधित आवेदन जमा कर सकते हैं।इसके अलावा संबंधित बूथ लेवल अधिकारी या निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी से भी संपर्क किया जा सकता है।यदि किसी मतदाता का नाम निर्वाचन अधिकारी के आदेश से हटाया गया है, तो वह नियमानुसार फैसले के खिलाफ अपील भी कर सकता है।
आगामी चुनावों पर पड़ सकता है असर
कर्नाटक में करीब एक करोड़ मतदाताओं की कमी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम होता है।ऐसे में मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, केवल मतदाताओं की संख्या कम होने के आधार पर किसी राजनीतिक दल को फायदा या नुकसान होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।अंतिम मतदाता सूची सामने आने के बाद अब राजनीतिक दलों और मतदाताओं की नजर इस बात पर रहेगी कि कहीं कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित तो नहीं रह गया है।
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