
नई दिल्ली/बेंगलुरु। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जारी विवाद एक बार फिर गहरा गया है। कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने मंगलवार को कर्नाटक को अगले 15 दिनों तक तमिलनाडु के लिए प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने की सिफारिश की है। समिति का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल बंटवारे को लेकर पहले से ही तनाव बना हुआ है।
दिल्ली में मंगलवार को CWRC की 140वीं बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता CWRC प्रमुख विनीत गुप्ता ने की। बैठक में कावेरी बेसिन में पानी की उपलब्धता, जलाशयों की स्थिति और तमिलनाडु की पानी की मांग समेत विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के बाद कर्नाटक से अगले 15 दिनों तक रोजाना 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने की सिफारिश की गई।
15 दिनों में करीब 16 टीएमसी पानी
CWRC की इस सिफारिश के अनुसार यदि कर्नाटक लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ता है, तो कुल मात्रा करीब 16 टीएमसी के आसपास होगी। यही वजह है कि समिति की सिफारिश को कर्नाटक के लिए एक महत्वपूर्ण दबाव के तौर पर देखा जा रहा है। कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे पर दोनों राज्यों के बीच पहले भी पानी छोड़ने को लेकर कई बार टकराव की स्थिति बन चुकी है।
हालांकि, CWRC की सिफारिश के बाद अब सभी की नजर कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की बैठक पर है। मंगलवार दोपहर 3 बजे होने वाली CWMA बैठक में इस सिफारिश पर अंतिम निर्णय लिया जाना है। इसलिए फिलहाल 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन की मात्रा को CWRC की सिफारिश के रूप में देखा जा रहा है।
पानी की उपलब्धता बना बड़ा मुद्दा
कर्नाटक लगातार यह तर्क देता रहा है कि कावेरी बेसिन में उपलब्ध पानी का आकलन करते समय राज्य की अपनी पेयजल और सिंचाई संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। खासतौर पर बेंगलुरु सहित राज्य के कई इलाकों की पेयजल जरूरतें कावेरी पर निर्भर हैं। ऐसे में तमिलनाडु के लिए बड़ी मात्रा में पानी छोड़ने का फैसला कर्नाटक सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकता है।
हाल के दिनों में कावेरी बेसिन में बारिश और जलाशयों में पानी की उपलब्धता को लेकर स्थिति में बदलाव भी देखने को मिला है। अगस्त की शुरुआत में कर्नाटक ने कबिनी जलाशय से 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ा था। उस समय अधिकारियों ने जलाशय में बढ़ती आवक और पानी के प्रवाह को देखते हुए पानी छोड़ने की जानकारी दी थी।
कर्नाटक सरकार पहले भी कावेरी जल छोड़ने के आदेशों को लेकर राज्य के हितों का मुद्दा उठाती रही है। वहीं तमिलनाडु का कहना है कि कावेरी के पानी पर उसकी कृषि जरूरतें काफी हद तक निर्भर हैं। खासकर कावेरी डेल्टा क्षेत्र में खेती के लिए समय पर पानी मिलना महत्वपूर्ण माना जाता है।
तमिलनाडु की मांग और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
कावेरी जल विवाद केवल दोनों राज्यों के प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि कई बार मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। हालिया विवाद में भी तमिलनाडु ने कर्नाटक से पानी छोड़ने की मांग को लेकर कानूनी रास्ता अपनाया है। तमिलनाडु ने कर्नाटक पर तय मात्रा में पानी नहीं छोड़ने का आरोप लगाया था और सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
कावेरी विवाद में पानी की मात्रा तय करने के साथ-साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कम बारिश या जल संकट की स्थिति में दोनों राज्यों के बीच पानी का बंटवारा किस अनुपात में किया जाए। लंबे समय से दोनों राज्य अपने-अपने हिस्से और जरूरतों को लेकर अलग-अलग दावे करते रहे हैं।
कर्नाटक के लिए बढ़ेगी चुनौती
CWRC की नई सिफारिश कर्नाटक सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में कावेरी पानी को लेकर पहले से राजनीतिक दबाव मौजूद है। राज्य सरकार के सामने एक ओर तमिलनाडु की पानी की मांग और दूसरी ओर कर्नाटक के किसानों तथा बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।
पिछले दिनों कावेरी पानी छोड़ने को लेकर कर्नाटक में विरोध भी देखने को मिला था। सरकार पर राज्य के हितों की रक्षा करने का दबाव बना हुआ है। वहीं तमिलनाडु में किसान लगातार अपने हिस्से का पानी मिलने की मांग कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने कावेरी विवाद को एक बार फिर दोनों राज्यों की राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
अब सबकी निगाहें मंगलवार दोपहर होने वाली CWMA बैठक पर टिकी हैं। यदि प्राधिकरण CWRC की सिफारिश को मंजूरी देता है, तो कर्नाटक को अगले 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ना होगा। ऐसे में आने वाले दिनों में कावेरी जल बंटवारे का यह मुद्दा दोनों राज्यों के बीच फिर से राजनीतिक और कानूनी विवाद का कारण बन सकता है।
फिलहाल CWRC की सिफारिश ने कर्नाटक सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है और अंतिम फैसला CWMA की बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा।





