
Karnataka कर्नाटक: 20 मई को बेंगलुरु के पर्वतारोही चिन्मयी त्रिशूलमूर्ति और संतोष देवराजप्पा ने माउंट एवरेस्ट की चोटी की ओर अपनी अंतिम चढ़ाई शुरू की, लेकिन उन्हें वहां ऐसे हालात का सामना करना पड़ा जिसकी उन्होंने पहले कल्पना भी नहीं की थी। 8849 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद ‘डेथ ज़ोन’ में पहुंचने के बाद उनकी यात्रा बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई।
जानकारी के अनुसार, पर्वतारोहियों का यह दल खतरनाक ऊंचाई वाले क्षेत्र में प्रवेश करते समय पूरी तरह तैयार था, जहां ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम होता है और मौसम की स्थिति अत्यंत कठोर रहती है। इस क्षेत्र में तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था, जिससे चढ़ाई और भी कठिन हो गई।
पर्वतारोहियों ने बताया कि उन्हें वहां धीमी गति से चलने वाली इंसानों की लंबी कतार में फंसकर रात बितानी पड़ी। स्थिति कुछ ऐसी थी जैसे शहरों में ट्रैफिक जाम होता है, लेकिन यहां जाम आसमान की ऊंचाइयों पर था। इसी कारण चढ़ाई की गति बेहद धीमी हो गई और कई घंटों तक आगे बढ़ना मुश्किल रहा।
सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन की कमी रही। लगातार बढ़ती ऊंचाई और लंबा इंतजार उनके लिए जोखिम भरा साबित हो सकता था। हालांकि, राहत की बात यह रही कि उनके समूह के हर सदस्य के पास तीन-तीन ऑक्सीजन सिलेंडर थे, जो 12 से 16 घंटे की अतिरिक्त आपूर्ति के लिए पर्याप्त थे।
इन सिलेंडरों की वजह से पर्वतारोहियों को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने में मदद मिली और उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी। उन्होंने बताया कि इस तैयारी ने उनकी जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चिन्मयी और संतोष ने कहा कि एवरेस्ट की चढ़ाई केवल शारीरिक ताकत की परीक्षा नहीं है, बल्कि मानसिक दृढ़ता और सही योजना की भी परीक्षा है। हर कदम पर बदलते मौसम और भीड़ जैसी परिस्थितियां इसे और भी चुनौतीपूर्ण बना देती हैं।
हालांकि ‘डेथ ज़ोन’ में बिताया गया समय उनके लिए बेहद कठिन था, लेकिन अंततः उन्होंने सुरक्षित रूप से अपनी चढ़ाई पूरी की और इस अनुभव को जीवन का सबसे यादगार और कठिन सफर बताया।
इस अभियान ने एक बार फिर साबित किया कि माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई केवल साहस का नहीं, बल्कि अत्यधिक धैर्य, तैयारी और टीमवर्क का भी परीक्षण है।





