
बेंगलुरु। कर्नाटक में 2021 में भूमि सुधार कानून में बदलाव के बाद कृषि जमीनों की बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राजस्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कानून में संशोधन के बाद राज्य में बेची गई कुल कृषि भूमि का करीब 60 फीसदी हिस्सा उत्तरी कर्नाटक के जिलों से संबंधित है। इस बदलाव के बाद गैर-किसानों के लिए कृषि भूमि खरीदने के नियमों को आसान बनाया गया था।
राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्यभर में इस अवधि के दौरान करीब 19.9 लाख एकड़ कृषि भूमि की बिक्री हुई है। यह बिक्री उस समय के बाद हुई जब तत्कालीन भाजपा सरकार ने कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम में संशोधन कर कृषि भूमि रखने और खरीदने से जुड़े प्रावधानों में बदलाव किया था।
कानून में बदलाव का उद्देश्य भूमि बाजार को अधिक लचीला बनाना बताया गया था, लेकिन इसके बाद कृषि भूमि की बढ़ती बिक्री को लेकर कई तरह की चिंताएं भी सामने आईं। कुछ लोगों का कहना है कि इससे खेती की जमीनों का स्वरूप बदल सकता है और छोटे किसानों पर इसका असर पड़ सकता है।
आंकड़ों के अनुसार, कृषि भूमि की बिक्री में उत्तरी कर्नाटक के जिलों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही है। इस क्षेत्र में विजयपुरा जिला सबसे आगे रहा, जहां सबसे ज्यादा कृषि भूमि की बिक्री दर्ज की गई। इसके बाद कलबुरागी जिले का स्थान रहा।
उत्तरी कर्नाटक लंबे समय से कृषि चुनौतियों का सामना करता रहा है। यहां कई इलाकों में बारिश की अनिश्चितता, सिंचाई सुविधाओं की कमी और खेती से जुड़ी आर्थिक परेशानियां किसानों के लिए बड़ी चुनौतियां रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि से होने वाली आय में अस्थिरता भी किसानों को जमीन बेचने के लिए मजबूर कर सकती है।
कृषि भूमि की बिक्री में बढ़ोतरी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें खेती की लागत में वृद्धि, फसल नुकसान, कर्ज का दबाव और बेहतर आय के लिए दूसरे क्षेत्रों की ओर रुख करना शामिल हैं।
कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम में किए गए संशोधन के बाद कृषि भूमि खरीदने के नियमों में बदलाव आया था। इससे पहले कृषि भूमि खरीदने के लिए कुछ विशेष शर्तें लागू थीं, जिनमें खरीदार की किसान पृष्ठभूमि और आय सीमा जैसे प्रावधान शामिल थे। संशोधन के बाद इन नियमों में कुछ ढील दी गई।
इस बदलाव के बाद रियल एस्टेट क्षेत्र और अन्य निवेशकों के लिए कृषि भूमि खरीदने की प्रक्रिया आसान हुई। हालांकि, इससे कृषि भूमि के गैर-कृषि इस्तेमाल और किसानों के भविष्य को लेकर बहस भी शुरू हुई।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जमीन की बिक्री के आंकड़ों को केवल निवेश के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का भी अध्ययन जरूरी है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां बड़ी संख्या में लोग खेती पर निर्भर हैं।
उत्तरी कर्नाटक के कई जिलों में खेती आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। ऐसे में बड़े पैमाने पर कृषि भूमि का हस्तांतरण स्थानीय रोजगार, कृषि उत्पादन और ग्रामीण जीवन पर असर डाल सकता है।
वहीं, कुछ लोगों का तर्क है कि भूमि कानूनों में बदलाव से किसानों को अपनी जमीन का बेहतर मूल्य मिलने और निवेश के नए अवसर पैदा होने की संभावना भी बढ़ सकती है। उनका कहना है कि जमीन बेचने का फैसला किसानों की आर्थिक जरूरतों से भी जुड़ा होता है।
राज्य सरकार के लिए अब चुनौती यह है कि विकास और निवेश के साथ-साथ कृषि भूमि संरक्षण और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए।
फिलहाल राजस्व विभाग के आंकड़ों ने कर्नाटक में कृषि भूमि बिक्री को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। उत्तरी कर्नाटक में जमीन बिक्री की अधिक हिस्सेदारी ने इस क्षेत्र की कृषि स्थिति और किसानों की आर्थिक चुनौतियों पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है।





