
बेंगलुरु। महाबलीपुरम में हाल ही में हुई दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने राजनीति में महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की जोरदार पैरवी की। उन्होंने लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव भी रखा। शिवकुमार ने सुझाव दिया कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक स्थिर रखा जाए और इन्हीं सीटों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाए। उनका कहना था कि महिलाएं अपने उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए लंबे समय से इंतजार कर रही हैं।
हालांकि, मुख्यमंत्री की यह मांग कर्नाटक की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर के बीच सवाल भी खड़े करती है। राज्य में उनकी अपनी पार्टी की महिला विधायक लंबे समय से मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व की उम्मीद लगाए बैठी हैं। कर्नाटक सरकार के मंत्रिमंडल में फिलहाल एक सीट खाली है, जिसे राजनीतिक गलियारों में अनौपचारिक रूप से ‘महिला कोटा’ के तौर पर देखा जा रहा है। इसके बावजूद राज्य की नौ महिला विधायकों में से किसी को भी यह भरोसा नहीं है कि खाली पद आखिरकार उनके हिस्से आएगा।
इस एकमात्र खाली सीट को लेकर पार्टी के भीतर दावेदारी जारी है। महिला विधायकों के साथ-साथ वरिष्ठ पुरुष नेता भी मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए सक्रिय रूप से लॉबिंग कर रहे हैं। ऐसे में महिला विधायकों के लिए यह तय कर पाना मुश्किल है कि खाली सीट पर किसे मौका मिलेगा।
मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर महिलाओं की उम्मीदें पहले भी पूरी नहीं हुई हैं। 3 अगस्त को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में भी किसी महिला विधायक को शामिल नहीं किया गया। इसके साथ ही राज्य सरकार के मंत्रिमंडल में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की उम्मीद एक बार फिर अधूरी रह गई।
इस विस्तार से पहले राजनीतिक हलकों में चर्चा थी कि MLC गायत्री शांथेगौड़ा को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कथित जोर के बाद कुरुबा समुदाय के नेता और ब्यादगी के विधायक बसवराज शिवन्नानवर को प्राथमिकता दी गई। परिणामस्वरूप विस्तार में शामिल सभी नए सदस्य पुरुष रहे।
महिला प्रतिनिधित्व को लेकर यह स्थिति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर महिला आरक्षण लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। संसद ने महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया है। इसके लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन से जुड़ी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में शिवकुमार का सीटों की संख्या स्थिर रखने और मौजूदा सीटों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने का सुझाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में शिवकुमार ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जोड़ते हुए कहा कि महिलाओं को उनका उचित हिस्सा मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि यदि लोकसभा की सीटों की संख्या में बदलाव के कारण महिला आरक्षण को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है, तो मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है।
लेकिन कर्नाटक की राजनीति में इस मुद्दे का दूसरा पहलू भी सामने आता है। राज्य में नौ महिला विधायक होने के बावजूद मंत्रिमंडल में उनकी मौजूदगी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। महिला विधायकों के लिए खाली एक पद ही फिलहाल संभावित अवसर माना जा रहा है। अगर इस सीट पर भी किसी पुरुष नेता को जगह मिलती है, तो सरकार में महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा और अधिक गंभीर हो सकता है।
कांग्रेस के भीतर मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल हमेशा राजनीतिक संतुलन से जुड़े रहे हैं। क्षेत्रीय, जातीय और राजनीतिक समीकरणों के अलावा वरिष्ठ नेताओं की पसंद और संगठनात्मक प्रभाव भी मंत्री पद तय करने में भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि महिला विधायकों के लिए केवल संख्या के आधार पर मंत्रिमंडल में जगह मिलना आसान नहीं रहा है।
3 अगस्त के विस्तार ने इस चुनौती को एक बार फिर सामने ला दिया। गायत्री शांथेगौड़ा का नाम संभावित दावेदारों में चर्चा में होने के बावजूद उन्हें मौका नहीं मिला। इसके बजाय बसवराज शिवन्नानवर को शामिल किए जाने से यह स्पष्ट हुआ कि कैबिनेट गठन में अन्य राजनीतिक समीकरण भी निर्णायक हैं।
महिला प्रतिनिधित्व के समर्थकों का कहना है कि राजनीतिक दलों को केवल चुनाव के दौरान महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें मंत्रिमंडल, पार्टी संगठन और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी पर्याप्त जगह दी जानी चाहिए। महिला विधायक चुने जाने के बाद यदि उन्हें कार्यपालिका में जिम्मेदारी नहीं मिलती, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व अधूरा माना जा सकता है।
कर्नाटक में यह बहस ऐसे समय में और महत्वपूर्ण हो गई है जब मुख्यमंत्री स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। एक तरफ शिवकुमार महिलाओं के लिए लोकसभा में आरक्षण और सीटों को स्थिर रखने का सुझाव दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी सरकार में महिला विधायकों को मंत्री पद के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
हालांकि, खाली सीट पर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व के हाथ में है। राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगला मंत्रिमंडल विस्तार कब होगा और किसे मौका मिलेगा। नौ महिला विधायकों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है।
यह स्थिति कांग्रेस के सामने एक राजनीतिक और नैतिक चुनौती भी रखती है। यदि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की वकालत करती है, तो राज्य स्तर पर उसे उसी नीति को व्यवहार में उतारने की उम्मीद भी की जाएगी।
फिलहाल कर्नाटक की महिला विधायकों की निगाहें मंत्रिमंडल की खाली सीट पर टिकी हैं। दूसरी ओर, वरिष्ठ पुरुष नेताओं की दावेदारी ने मुकाबले को और जटिल बना दिया है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अगला कदम क्या उठाती है और क्या मुख्यमंत्री की महिला प्रतिनिधित्व को लेकर सार्वजनिक पैरवी राज्य के मंत्रिमंडल में भी दिखाई देती है।





