कर्नाटक

POCSO मामलों को छिपाने वाले स्कूलों पर भी होगी कार्रवाई, कर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Kavita2
12 July 2026 11:52 AM IST
POCSO मामलों को छिपाने वाले स्कूलों पर भी होगी कार्रवाई, कर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
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Karnataka कर्नाटक: हाई कोर्ट ने बच्चों के साथ यौन शोषण से जुड़े मामलों को छिपाने वाले शैक्षणिक संस्थानों को कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी स्कूल या शिक्षण संस्थान को बच्चे के साथ हुए सेक्सुअल अब्यूज की जानकारी मिलती है और वह इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को नहीं देता, तो यह भी गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे संस्थानों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।

हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उडुपी जिले के एक रेजिडेंशियल स्कूल के प्रिंसिपल, एसोसिएट प्रिंसिपल और वार्डन के खिलाफ दर्ज POCSO एक्ट के मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए की।

तीन अधिकारियों ने हाई कोर्ट में दाखिल की थी याचिका

मामले में स्कूल के प्रिंसिपल, एसोसिएट प्रिंसिपल और वार्डन ने अपने खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था। उनके खिलाफ पीड़ित छात्र के पिता की शिकायत के आधार पर POCSO एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोपियों पर POCSO एक्ट की धारा 4, 8 और 21 के तहत केस दर्ज किया गया था। इसमें यौन अपराध से जुड़े प्रावधानों के साथ-साथ अपराध की जानकारी नहीं देने से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में दलील दी कि उनके खिलाफ दर्ज मामला उचित नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस स्तर पर मामले को खत्म करने से इनकार कर दिया।

शिकायत में लगाए गए आरोपों को माना जाएगा सही

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने कहा कि जब मामला शुरुआती चरण में हो और आरोपों को चुनौती दी जा रही हो, तब शिकायत में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मानकर आगे बढ़ना होता है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केवल जानकारी नहीं देने का आरोप नहीं है, बल्कि आरोप इससे कहीं अधिक गंभीर हैं। इसलिए जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना जरूरी है।

POCSO मामलों की जानकारी देना अनिवार्य

हाई कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को यदि ऐसे अपराध की जानकारी मिलती है तो उसे संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा होती है क्योंकि बच्चे स्कूलों में सुरक्षित माहौल की उम्मीद के साथ आते हैं।

यदि कोई संस्थान किसी बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की जानकारी छिपाता है या कार्रवाई करने में लापरवाही करता है, तो उसे भी कानून का सामना करना पड़ेगा।

स्कूलों की जिम्मेदारी पर जोर

हाई कोर्ट ने कहा कि स्कूल केवल शिक्षा देने की जगह नहीं हैं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी स्कूल प्रशासन को यह अधिकार नहीं है कि वह बच्चों से जुड़े गंभीर मामलों को आंतरिक स्तर पर दबाने की कोशिश करे।

यदि किसी बच्चे के साथ अपराध हुआ है तो इसकी जानकारी पुलिस और संबंधित बाल सुरक्षा अधिकारियों को देना जरूरी है।

संस्थानों को दी गई चेतावनी

हाई कोर्ट की टिप्पणी को राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों में चुप्पी साधना या मामले को छिपाने की कोशिश करना अपराध को बढ़ावा देने जैसा है।

ऐसे मामलों में स्कूल प्रबंधन, प्रधानाचार्य और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।

बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है और किसी भी तरह की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से बचाना और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करना है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति या संस्था कानून के तहत जरूरी सूचना देने में विफल रहती है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।

मामले की जांच जारी रहेगी

हाई कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामला जारी रहेगा। पुलिस और जांच एजेंसियां मामले में आगे की कार्रवाई करेंगी।

कोर्ट ने इस स्तर पर आरोपों की सच्चाई पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट किया है कि मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ना चाहिए।

हाई कोर्ट के फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोर्ट का यह आदेश शैक्षणिक संस्थानों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। इससे साफ है कि बच्चों से जुड़े यौन अपराधों में केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि जानकारी छिपाने वाले लोग और संस्थान भी कानून के दायरे में आ सकते हैं।

यह फैसला स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और बच्चों से जुड़े मामलों में तुरंत कार्रवाई करने की जिम्मेदारी की याद दिलाता है।

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