
Jharkhand झारखंड : कभी दूसरे प्रदेश में जाकर किसी रसूखदार परिवार के यहां रसोइया का काम करने वाले 50 वर्षीय वासुदेव प्रसाद आज अपनी मेहनत और जिद के दम पर इलाके के किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। उन्होंने मनरेगा की आम बागवानी योजना का लाभ उठाकर 3 एकड़ जमीन पर ऐसा आम का बगीचा तैयार किया है, जो अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
वासुदेव प्रसाद ने साबित कर दिया है कि अगर मेहनत और सही योजना का साथ मिल जाए तो खेती भी रोजगार और समृद्धि का बड़ा माध्यम बन सकती है। कभी सीमित आमदनी के लिए संघर्ष करने वाले वासुदेव आज अपने बगीचे से लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं।
मनरेगा योजना से शुरू हुआ बदलाव का सफर
वासुदेव प्रसाद ने साल 2021 में मनरेगा के तहत संचालित आम बागवानी योजना को अपनाया। उन्होंने अपनी 3 एकड़ जमीन पर आम के पौधे लगाए और उनकी देखभाल शुरू की।
शुरुआत में यह काम आसान नहीं था। पौधों की देखभाल, सिंचाई, खाद और रखरखाव में काफी मेहनत करनी पड़ी। लेकिन वासुदेव ने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत करते रहे।
धीरे-धीरे उनके लगाए गए पौधे बड़े हुए और अब वही पौधे फल देने वाले पेड़ों में बदल चुके हैं।
3 एकड़ जमीन पर खड़ा किया आम का साम्राज्य
वासुदेव प्रसाद का बगीचा आज इलाके में एक उदाहरण बन गया है। 3 एकड़ जमीन पर फैले इस आम के बगीचे में बड़ी संख्या में पेड़ लगे हैं, जिन पर हर साल अच्छी मात्रा में फल आते हैं।
उनकी सफलता देखकर आसपास के किसान भी प्रेरित हो रहे हैं। कई लोग अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ फलदार पौधों की खेती की ओर ध्यान देने लगे हैं।
वासुदेव का कहना है कि खेती में धैर्य और मेहनत सबसे जरूरी है। उन्होंने कई साल तक पेड़ों की देखभाल की, जिसका परिणाम अब उन्हें मिल रहा है।
इस सीजन में 50 क्विंटल आम बेच चुके हैं
वासुदेव प्रसाद ने बताया कि इस साल उनके बगीचे से अब तक करीब 50 क्विंटल आम की बिक्री हो चुकी है। उन्होंने बाजार में 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से आम बेचे हैं।
इस बिक्री से उन्हें लाखों रुपये की आमदनी हुई है। खास बात यह है कि आम का सीजन आगे भी जारी है और उनके बगीचे के पेड़ों पर अभी भी बड़ी मात्रा में फल लगे हुए हैं।
उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बिक्री और बढ़ेगी और इस साल आम की खेती से उनकी कमाई में और इजाफा होगा।
बाजार में है उनके आमों की अच्छी मांग
वासुदेव के बगीचे के आमों की बाजार में अच्छी मांग बताई जा रही है। बेहतर गुणवत्ता और स्वाद के कारण लोग उनके आम पसंद कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि मेहनत से तैयार किए गए बगीचे का फायदा अब मिलने लगा है। आम की बिक्री के लिए उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि स्थानीय बाजार में उनके फल की मांग बनी रहती है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
वासुदेव प्रसाद की कहानी संघर्ष और सफलता की मिसाल है। एक समय ऐसा था जब वह दूसरे प्रदेश में जाकर रसोइया का काम करके परिवार का पालन-पोषण करते थे।
लेकिन उन्होंने खेती को अपनी ताकत बनाया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति बदल दी। उन्होंने साबित किया कि मेहनत और सही दिशा में प्रयास करने से कोई भी व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकता है।
किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत
आज वासुदेव प्रसाद केवल आम की खेती करने वाले किसान नहीं हैं, बल्कि आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
उनकी सफलता यह दिखाती है कि सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल कर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। मनरेगा की आम बागवानी योजना ने उन्हें शुरुआत करने का अवसर दिया और उनकी मेहनत ने उसे सफलता में बदल दिया।
खेती में नई सोच की जरूरत
वासुदेव का मानना है कि किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी जैसी योजनाओं को भी अपनाना चाहिए। फलदार पौधों की खेती लंबे समय में अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है।
उन्होंने कहा कि शुरुआत में धैर्य रखना पड़ता है, क्योंकि पेड़ों को फल देने में समय लगता है। लेकिन एक बार बगीचा तैयार हो जाए तो लगातार आय का स्रोत बन सकता है।
गांव और क्षेत्र के लिए बनी मिसाल
वासुदेव प्रसाद की सफलता अब पूरे क्षेत्र के लिए एक उदाहरण बन गई है। उनका आम का बगीचा यह संदेश दे रहा है कि मेहनत, लगन और सरकारी योजनाओं के सही उपयोग से ग्रामीण क्षेत्र में भी आर्थिक बदलाव लाया जा सकता है।
कभी दूसरों के घरों में काम करने वाले वासुदेव आज अपनी मेहनत से खुद की पहचान बना चुके हैं। उनका सफर उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो खेती को सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि सफलता और आत्मनिर्भरता का रास्ता बनाना चाहते हैं।





