झारखंड

फंड और तकनीकी पेच में फंसी स्कॉलरशिप, पढ़ाई छोड़ने को मजबूर विद्यार्थी

Saba Naaz
27 Jun 2026 3:23 PM IST
फंड और तकनीकी पेच में फंसी स्कॉलरशिप, पढ़ाई छोड़ने को मजबूर विद्यार्थी
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रांची: झारखंड में अनुसूचित जनजाति (ST) के विद्यार्थियों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकार के बीच जारी प्रशासनिक व वित्तीय खींचतान के कारण राज्य के लगभग ढाई लाख आदिवासी छात्र-छात्राओं की प्री और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति पिछले एक साल से अधर में लटकी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड के आदिवासी विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति का कुल ३६४ करोड़ रुपये केंद्र सरकार पर बकाया है, जिसके कारण छात्रों को वजीफे की पूरी राशि का भुगतान नहीं हो सका है। यह पूरी बकाया राशि चालू वित्तीय वर्ष २०२६-२७ से ठीक पहले की है। इसमें वित्तीय वर्ष २०२५-२६ की प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति का २८ करोड़ रुपये और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति का लगभग ३३६ करोड़ रुपये का केंद्रांश शामिल है। इस गंभीर समस्या को लेकर झारखंड के कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने दिल्ली में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल उरांव से मुलाकात कर लंबित राशि को जल्द से जल्द जारी करने की पुरजोर मांग की है।

राज्य सरकार का दावा: अपने हिस्से की ४०% राशि बांटी

कल्याण विभाग के अनुसार, वित्तीय वर्ष २०२५-२६ में केंद्र सरकार से केंद्रांश (Central Share) की राशि प्राप्त नहीं होने के बावजूद राज्य सरकार ने अपने स्तर पर प्रयास किए थे। राज्य सरकार ने कल्याण विभाग के माध्यम से अपने हिस्से (राज्यांश) की ४० प्रतिशत राशि की निकासी कर विद्यार्थियों के बीच आंशिक रूप से छात्रवृत्ति का वितरण किया था ताकि उनकी पढ़ाई पूरी तरह न रुके। प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति का दावा: झारखंड सरकार ने पूर्व के वर्षों के एरियर को मिलाकर लगभग ६६ करोड़ रुपये की मांग १४ जुलाई २०२५ को की थी। बाद में केंद्र के दिसंबर २०२५ के एक पत्र के आलोक में संशोधित करते हुए २८ करोड़ रुपये की मांग भेजी गई, जो अब तक लंबित है। पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति का दावा: राज्य ने १४ जुलाई २०२५ को ही ३३६ करोड़ रुपये की मांग केंद्र के समक्ष रखी थी। यह राशि न मिलने के बाद अब राज्य सरकार ने २० मई २०२६ को नए वित्तीय वर्ष २०२६-२७ के लिए भी १३८ करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग केंद्र से की है।

क्या है छात्रवृत्ति का गणित और हिस्सेदारी?

झारखंड में विभिन्न वर्गों की छात्रवृत्ति योजनाओं में केंद्र और राज्य सरकार की हिस्सेदारी का तय पैमाना इस प्रकार है:

अनुसूचित जनजाति (ST): २५% राज्यांश और ७५% केंद्रांश

अनुसूचित जाति (SC): ४०% राज्यांश और ६०% केंद्रांश

पिछड़ा वर्ग (BC): ४०% राज्यांश और ६०% केंद्रांश

प्री-मैट्रिक योजना (वार्षिक): कक्षा १ से ८ तक की शत-प्रतिशत राशि राज्य सरकार खुद वहन करती है। इसके तहत कक्षा १ से ५ के छात्रों को १५०० रुपये और कक्षा ६ से ८ के छात्रों को २५०० रुपये दिए जाते हैं। वहीं कक्षा ९ से १० के विद्यार्थियों को ४५०० रुपये मिलते हैं (जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी शामिल है)।

पोस्ट मैट्रिक योजना: यह छात्रवृत्ति उन विद्यार्थियों को मिलती है जिनके परिवार की वार्षिक आय २.५ लाख रुपये तक है। इसके तहत कुल ४ ग्रुप बनाए गए हैं। ग्रुप १-ए में हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को १,००,००० रुपये और डे-स्कॉलर को ९०,००० रुपये तक की वार्षिक सहायता का प्रावधान है। इसी तरह अन्य ग्रुप्स में ३०,००० रुपये से लेकर ८५,००० रुपये तक की राशि दी जाती है।

सियासी वार-पलटवार: क्या कहते हैं जिम्मेदार?

इस पूरे गतिरोध पर राजनीति और बयानों का दौर भी गर्म है। वर्तमान कल्याण मंत्री चमरा लिंडा का कहना है कि यह योजना संयुक्त भागीदारी से चलती है और दोनों हिस्से मिलने के बाद ही पूरा भुगतान संभव हो पाता है। उन्होंने उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) समय पर न देने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य की तरफ से सभी कागजात भेजे जा चुके हैं। केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने सचिव को जल्द प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। दूसरी तरफ, आदिवासी मामलों के पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि छात्रवृत्ति की पूरी प्रक्रिया अब ऑनलाइन (DBT) है। जब राज्य सरकार छात्रों का सही आंकड़ा पोर्टल पर भेजती है, तो डेटा मैच होने के बाद सीधे खातों में पैसा जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य सरकार को केंद्रीय स्तर पर दोष मढ़ने के बजाय अपने स्तर पर डेटा और तकनीकी प्रक्रियाओं की कमियों को सुधारना चाहिए। बहरहाल, इस व्यवस्थागत लड़ाई में नुकसान सिर्फ उन गरीब आदिवासी छात्रों का हो रहा है, जिनकी पढ़ाई फीस न भर पाने के कारण छूटने की कगार पर है।

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