
रांची। झारखंड में कोयला चोरी, अवैध खनन पर रोक और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अब एक व्यापक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किया जाएगा। झारखंड हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इस दिशा में प्रक्रिया तेज हो गई है। इसी सिलसिले में दो दिन पहले एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें कोयला चोरी और अवैध खनन से निपटने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार करने पर विस्तार से चर्चा हुई।
बैठक की अध्यक्षता भारत सरकार की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल और एएसजीआई प्रशांत पल्लव तथा झारखंड के महाधिवक्ता वरिष्ठ अधिवक्ता रोहिताश्य राय ने की। बैठक में संबंधित विभागों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा एक ऐसी साझा कार्यप्रणाली तैयार करने पर जोर दिया गया, जिसके आधार पर कोयला चोरी और अवैध खनन के मामलों में तेजी से कार्रवाई की जा सके।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद तैयार की जा रही इस SOP का उद्देश्य सिर्फ अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई करना नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाना भी है। बैठक में इस बात पर विचार किया गया कि कोयला चोरी की पहचान से लेकर कार्रवाई, जब्ती, जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया तक अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारियां किस तरह स्पष्ट की जाएं।
झारखंड लंबे समय से कोयला उत्पादन के लिए देश के प्रमुख राज्यों में शामिल रहा है। राज्य के कई जिलों में बड़ी संख्या में कोयला खदानें हैं। इसी वजह से कोयला परिवहन, खनन क्षेत्रों की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों की निगरानी राज्य और केंद्र की एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण विषय है। अवैध खनन और कोयला चोरी के मामलों में कई विभागों के अधिकार क्षेत्र जुड़े होने के कारण समन्वित कार्रवाई की जरूरत महसूस की जाती रही है।
बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि अवैध खनन से जुड़े मामलों में सिर्फ मौके पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि अवैध खनन के पीछे कौन लोग हैं, खनिज कहां से निकाला जा रहा है, उसका परिवहन किस माध्यम से हो रहा है और उसे कहां खपाया जा रहा है। नई SOP में ऐसे मामलों की निगरानी और सूचना साझा करने की व्यवस्था को शामिल किया जा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण भी इस पूरी कवायद का अहम हिस्सा है। अवैध खनन से जमीन, जलस्रोत और आसपास के पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। इसलिए बैठक में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए ठोस नीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। खनन क्षेत्रों में पर्यावरणीय नियमों के पालन, क्षतिग्रस्त क्षेत्रों की निगरानी और संबंधित विभागों के बीच सूचना साझा करने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
प्रस्तावित SOP में सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका को भी स्पष्ट किए जाने की तैयारी है। कोयला क्षेत्रों में पुलिस, प्रशासन, खनन विभाग और सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियां अपने-अपने स्तर पर काम करती हैं। इनके बीच समन्वय मजबूत करने से कार्रवाई की गति बढ़ सकती है। बैठक में इसी उद्देश्य से एक साझा तंत्र विकसित करने पर विचार किया गया।
हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होनी है। इससे पहले संबंधित विभागों और सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय से SOP तैयार करने की तैयारी है। इस दस्तावेज के माध्यम से अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा कि कोयला चोरी, अवैध खनन और पर्यावरणीय नुकसान को रोकने के लिए सरकार और संबंधित एजेंसियां किस तरह की कार्यप्रणाली अपनाने जा रही हैं।
अदालत के समक्ष स्थिति स्पष्ट करने के लिए SOP में कार्रवाई की जिम्मेदारी, निगरानी तंत्र, सूचना साझा करने की प्रक्रिया और आपसी समन्वय से जुड़े बिंदु शामिल किए जाने की संभावना है। इससे अलग-अलग विभागों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर होने वाली संभावित अस्पष्टता को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
बैठक के दौरान यह भी माना गया कि अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए नियमित निगरानी जरूरी है। सिर्फ शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने की बजाय संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां निरंतर निगरानी की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। तकनीकी साधनों और मैदानी स्तर की निगरानी दोनों को जोड़ने पर भी विचार किया जा रहा है।
कोयला चोरी के मामलों में परिवहन व्यवस्था की निगरानी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। कोयला खदानों से बाहर निकलने के बाद उसका अवैध परिवहन रोकना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में संबंधित विभागों के रिकॉर्ड और जांच व्यवस्था को बेहतर ढंग से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
पर्यावरणीय पहलू के तहत खनन क्षेत्रों में पानी, मिट्टी और हरित क्षेत्र से संबंधित प्रभावों की निगरानी पर भी ध्यान दिया जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र में अवैध खनन के कारण पर्यावरणीय नुकसान की स्थिति बनती है तो संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी और सुधारात्मक कदमों का उल्लेख SOP में किया जा सकता है।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद हुई बैठक को इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे पहले विभिन्न स्तरों पर कोयला चोरी और अवैध खनन के मामलों में कार्रवाई होती रही है, लेकिन अब एक व्यापक और समन्वित SOP बनाने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इसका मकसद कार्रवाई के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करना बताया जा रहा है।
झारखंड में कोयला चोरी और अवैध खनन से जुड़े मामलों का असर सिर्फ राजस्व और खनन व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। ऐसे मामलों में कानून-व्यवस्था, सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासन से जुड़े कई पहलू सामने आते हैं। इसलिए प्रस्तावित SOP में इन सभी पक्षों को एक साथ शामिल किए जाने पर जोर दिया जा रहा है।
बैठक में शामिल अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच यह विचार भी सामने आया कि नीति ऐसी होनी चाहिए जिसे जमीन पर आसानी से लागू किया जा सके। इसके लिए विभागवार जिम्मेदारियां और कार्रवाई की समयसीमा स्पष्ट करना उपयोगी हो सकता है। साथ ही किसी घटना की सूचना मिलने पर संबंधित एजेंसियों तक जानकारी पहुंचाने की प्रक्रिया को भी व्यवस्थित करना जरूरी होगा।
आने वाले दिनों में संबंधित विभाग और सुरक्षा एजेंसियां बैठक में हुई चर्चा के आधार पर SOP का प्रारूप तैयार कर सकती हैं। इसके बाद इसे आवश्यक स्तर पर मंजूरी और समन्वय के लिए रखा जाएगा। 8 अक्टूबर की सुनवाई से पहले सरकार की कोशिश होगी कि हाईकोर्ट के समक्ष कार्रवाई की दिशा और प्रस्तावित व्यवस्था को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जा सके।
फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा फोकस एक ऐसी व्यापक SOP तैयार करने पर है, जो कोयला चोरी और अवैध खनन की रोकथाम के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी एक साथ संबोधित करे। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद हुई बैठक ने इस प्रक्रिया को गति दी है और अब संबंधित विभागों के बीच समन्वय के जरिए आगे की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
8 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार की ओर से अदालत के समक्ष क्या प्रस्ताव रखा जाता है और प्रस्तावित SOP में कोयला चोरी, अवैध खनन तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए कौन-कौन से ठोस प्रावधान शामिल किए जाते हैं।





