
झारखंड : बालू की उपलब्धता लंबे समय से आम लोगों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। राज्य में बालू की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्यों के लिए सस्ता और आसानी से उपलब्ध बालू मिलना मुश्किल बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह बालू घाटों की लंबे समय तक नीलामी नहीं होना और नीलाम हो चुके घाटों का भी समय पर संचालन शुरू नहीं हो पाना है।
काफी समय बाद जून 2026 में हेमंत सरकार ने राज्य के सभी 444 बालू घाटों की नीलामी प्रक्रिया शुरू की। कई घाटों को समूहों में बांटकर नीलामी कराई गई। इस प्रक्रिया में 302 बालू घाट नीलाम हो गए। सरकार को उम्मीद थी कि इससे राज्य में वैध बालू की आपूर्ति बढ़ेगी और लोगों को निर्माण कार्यों के लिए सस्ता बालू उपलब्ध होगा।
लेकिन नीलामी के करीब चार महीने बाद भी स्थिति उम्मीद के मुताबिक नहीं बदली है। पूरे प्रदेश में अभी केवल छह जिलों के 14 घाट ऐसे हैं, जहां से कानूनी तरीके से बालू का उठाव संभव है। बाकी अधिकतर घाट कागजी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसे हुए हैं।
स्थिति यह है कि 302 घाटों की नीलामी होने के बावजूद इनमें से 288 घाट अब भी पूरी तरह चालू नहीं हो पाए हैं। इन घाटों के संचालन के लिए अलग-अलग विभागों और एजेंसियों से पांच जरूरी प्रमाणपत्र और स्वीकृतियां प्राप्त करनी हैं। जब तक ये सभी दस्तावेज पूरे नहीं होते, तब तक संबंधित घाटों से बालू उठाव शुरू नहीं किया जा सकता।
इस बीच राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी NGT की ओर से मानसून अवधि में बालू खनन पर लगाई गई रोक 15 अक्टूबर से हटने वाली है। प्रतिबंध हटने के बाद राज्य में वैध रूप से बालू उठाव की गतिविधियां कुछ हद तक बढ़ने की उम्मीद है।
हालांकि इससे भी तुरंत बड़ी राहत मिलने की संभावना कम बताई जा रही है। अभी जिन 14 घाटों से वैध उठाव संभव है, उन्हीं से बालू की उपलब्धता बढ़ेगी। लेकिन प्रदेश की जरूरतों की तुलना में यह संख्या काफी कम है। ऐसे में निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों को सस्ता बालू मिलने में अभी कुछ और समय लग सकता है।
राज्य में बालू की मांग लगातार बनी रहती है। घर निर्माण, सड़क, पुल, सरकारी परियोजनाएं और निजी निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर बालू पर निर्भर हैं। लेकिन वैध आपूर्ति सीमित होने से बाजार में बालू की कीमतें बढ़ जाती हैं। कई जगह लोगों को ज्यादा कीमत चुकाकर बालू खरीदना पड़ता है।
नीलामी न होने के कारण पिछले वर्षों में अवैध बालू कारोबार और तस्करी की शिकायतें भी लगातार सामने आती रही हैं। वैध घाट बंद रहने की स्थिति में मांग को पूरा करने के लिए अवैध तरीके से बालू निकासी और परिवहन का खतरा बढ़ जाता है।
सरकार का दावा रहा है कि नीलामी प्रक्रिया पूरी होने और घाटों के नियमित संचालन से बालू की उपलब्धता बढ़ेगी। साथ ही अवैध कारोबार पर अंकुश लगेगा और सरकार को राजस्व भी मिलेगा।
लेकिन मौजूदा स्थिति बताती है कि केवल नीलामी होना पर्याप्त नहीं है। जब तक सभी आवश्यक पर्यावरणीय, प्रशासनिक और तकनीकी अनुमतियां पूरी नहीं हो जातीं, तब तक घाटों से वैध उठाव शुरू नहीं किया जा सकता।
अब 15 अक्टूबर के बाद प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती नीलाम हो चुके बाकी 288 घाटों को तेजी से चालू करने की होगी। अधिकारियों को संबंधित प्रमाणपत्र और दस्तावेजों की प्रक्रिया जल्द पूरी करानी होगी।
जानकारी के अनुसार, पांच आवश्यक प्रमाणपत्र मिल जाने के बाद घाटों का संचालन शुरू हो सकता है। इन प्रमाणपत्रों में पर्यावरण और अन्य नियामकीय स्वीकृतियां शामिल होती हैं। प्रक्रिया पूरी होने में देरी होने से नीलामी का वास्तविक फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
आम लोगों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि बालू आखिर कब सस्ता होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब बड़ी संख्या में घाट चालू होंगे और बाजार में वैध बालू की आपूर्ति बढ़ेगी, तभी कीमतों में कमी आने की संभावना बनेगी।
फिलहाल केवल 14 घाटों से वैध उठाव शुरू होने पर सीमित राहत ही मिल सकती है। बड़ी राहत तब होगी जब 288 अन्य घाटों का संचालन भी शुरू हो जाएगा।
राज्य में बालू की कीमतों पर परिवहन लागत का भी असर पड़ता है। यदि नजदीकी घाट बंद हैं और दूर से बालू मंगाना पड़ता है तो कीमत बढ़ जाती है। इसलिए ज्यादा घाट चालू होने से स्थानीय स्तर पर आपूर्ति बढ़ेगी और परिवहन खर्च भी कम हो सकता है।
झारखंड में लंबे समय से सस्ते बालू की मांग उठती रही है। सरकार ने नीलामी कर इस दिशा में कदम जरूर बढ़ाया है, लेकिन जमीनी असर अभी सीमित है।
15 अक्टूबर के बाद NGT की रोक हटने से प्रशासनिक प्रक्रिया तेज होने और वैध बालू उठाव बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन बालू की कीमतें वास्तव में कब कम होंगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शेष नीलाम घाट कितनी जल्दी चालू किए जाते हैं।
फिलहाल राज्य सरकार और संबंधित विभागों के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि नीलामी के बाद आवश्यक मंजूरियां समय पर पूरी हों और बालू घाटों से कानूनी तरीके से उठाव शुरू हो सके।
यदि शेष 288 घाट जल्द चालू होते हैं तो आने वाले महीनों में बालू की उपलब्धता बढ़ सकती है और आम लोगों को राहत मिल सकती है।





