जम्मू और कश्मीर

पर्यटन को मिलेगा नया विस्तार इको-टूरिज्म से बढ़ेंगे सैलानी और होमस्टे से रोजगार

nidhi
2 Sept 2026 9:07 AM IST
पर्यटन को मिलेगा नया विस्तार इको-टूरिज्म से बढ़ेंगे सैलानी और होमस्टे से रोजगार
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नया विस्तार इको-टूरिज्म से बढ़ेंगे सैलानी

श्रीनगर: कश्मीर में स्थानीय स्तर पर इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की मांग तेज हुई है। लोगों का मानना है कि पर्यटन को श्रीनगर, गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग जैसे स्थापित स्थलों तक सीमित रखने के बजाय घाटी के कम चर्चित और प्राकृतिक रूप से समृद्ध इलाकों तक पहुंचाया जाना चाहिए। इससे पर्यटकों को नए स्थान देखने का मौका मिलने के साथ ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

जम्मू-कश्मीर आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी पर्यटन के विस्तार के लिए ऑफबीट डेस्टिनेशन, ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे और समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया गया है। सरकार उभरते पर्यटन स्थलों के सतत विकास के लिए सरकारी और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य पर्यटन का लाभ उन दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाना है जो अब तक मुख्य पर्यटन सर्किट से बाहर रहे हैं।
इको-टूरिज्म का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय रोजगार के रूप में सामने आ सकता है। नए क्षेत्रों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने पर स्थानीय परिवार अपने घरों को होमस्टे में बदल सकते हैं। इसके अलावा स्थानीय युवाओं के लिए टूरिस्ट गाइड, टैक्सी सेवा, ट्रेकिंग, कैंपिंग, स्थानीय खानपान और हस्तशिल्प से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। जम्मू-कश्मीर में होमस्टे मॉडल पहले ही तेजी से विस्तार कर रहा है। अगस्त में हुई समीक्षा बैठक में अधिकारियों ने बताया था कि केंद्र शासित प्रदेश में 2,802 होमस्टे यूनिट हैं जिनमें कुल 20,514 बेड की क्षमता है। मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने भी होमस्टे को कम चर्चित पर्यटन स्थलों के विकास का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया था।
सीमावर्ती और ऑफबीट क्षेत्रों में पर्यटन बढ़ने के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। केरन, गुरेज, माछिल, तंगधार, टीटवाल और तुलैल जैसे क्षेत्रों में पर्यटकों की दिलचस्पी बढ़ी है। माछिल घाटी में स्थानीय लोग बेहतर बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं ताकि ज्यादा पर्यटक इलाके तक पहुंच सकें और होमस्टे के जरिए स्थानीय परिवारों की आय बढ़े।
हालांकि इको-टूरिज्म के विस्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण बड़ी चुनौती होगी। कश्मीर का पारिस्थितिकी तंत्र संवेदनशील है। इसलिए नए पर्यटन स्थलों पर अनियंत्रित निर्माण, प्लास्टिक कचरा और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को रोकने के लिए ठोस व्यवस्था जरूरी होगी। स्थानीय समुदायों को पर्यटन से जोड़ते हुए पर्यटकों की संख्या और बुनियादी ढांचे के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा। अगर योजनाबद्ध तरीके से इको-टूरिज्म विकसित किया जाता है तो कश्मीर के अनछुए प्राकृतिक स्थल नई पहचान हासिल कर सकते हैं। इससे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर दबाव कम होने के साथ दूरदराज गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और स्थानीय कारोबार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
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