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जम्मू और कश्मीर
हाईकोर्ट ने PSA हिरासत के पुराने आधार को खारिज किया
Ratna Netam
6 May 2026 3:43 PM IST

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Jammu.जम्मू: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि पीपुल्स स्पेशल एक्ट (PSA) के तहत किसी व्यक्ति की हिरासत को पुराने आधार पर नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह फैसला सुरक्षा कानूनों और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के महत्व को ध्यान में रखते हुए दिया।
इस मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावेदार का कहना था कि उसे PSA के तहत हिरासत में लिया गया है, जबकि उसका मामला पहले से ही किसी पुराने आरोप या हिरासत के आधार पर निपट चुका था। याचिका में यह तर्क भी पेश किया गया कि पुराने आधार पर हिरासत लागू करना कानूनी रूप से अनुचित और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के अंतर्गत आता है।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि PSA के तहत किसी भी व्यक्ति की हिरासत केवल वर्तमान और स्पष्ट खतरे या अपराध की सूरत में ही मान्य है। पुराने मामलों, जो पहले से निपट चुके हैं, उन्हें आधार मानकर किसी की स्वतंत्रता को सीमित करना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि अधिकारियों को हिरासत के आदेश जारी करने से पहले सभी वर्तमान तथ्यों और परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना होगा।
अधिकारियों ने बताया कि PSA के तहत हिरासत का उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा और गंभीर अपराधों से निपटना है। लेकिन न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने कहा, “कानून की दृष्टि से, किसी भी हिरासत आदेश की वैधता वर्तमान परिस्थितियों और ठोस आधार पर ही मापी जा सकती है, पुराने या निष्क्रिय मामलों पर आधारित नहीं।”
विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक संकेत है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि PSA का दुरुपयोग न हो और हिरासत आदेश केवल वैध और न्यायसंगत कारणों पर आधारित हों। यह फैसला अधिकारियों को भी अधिक जिम्मेदारी और सावधानी के साथ कार्रवाई करने की आवश्यकता का संदेश देता है।
लोक अदालतों और न्यायिक संस्थानों में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनज़र, यह निर्णय लोगों के लिए राहत का कारण माना जा रहा है। नागरिक अधिकार संगठन इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं और इसे न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि सुरक्षा कानूनों के अंतर्गत भी कानूनी प्रक्रियाओं और मौलिक अधिकारों का सम्मान अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने इस निर्णय के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रकार का अधिनायकवादी या मनमाना प्रयोग कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं होगा।
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