जम्मू और कश्मीर

Jammu and Kashmir में उर्दू के स्थान पर नई भाषा नीतियों की आलोचना

Ratna Netam
30 April 2026 5:43 PM IST
Jammu and Kashmir में उर्दू के स्थान पर नई भाषा नीतियों की आलोचना
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Kashmir.कश्मीर: जम्मू-कश्मीर में उर्दू भाषा के संरक्षण और उपयोग को लेकर विवाद गरमाता जा रहा है। इल्तिजा नामक सामाजिक संगठन ने आरोप लगाया है कि उमर अब्दुल्ला की सरकार के कार्यकाल में उर्दू को सिस्टमैटिक तरीके से हटाया गया, और प्रशासनिक, शैक्षणिक और सरकारी दस्तावेजों में इसकी जगह अन्य भाषाओं को बढ़ावा दिया गया।
इल्तिजा ने बताया कि जम्मू-कश्मीर की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत के लिए उर्दू का महत्व बहुत अधिक है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों, विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक दस्तावेजों में उर्दू भाषा का उपयोग लगातार कम किया गया, जिससे इस भाषा की पैठ कमजोर हुई। संगठन का कहना है कि यह कदम सिर्फ भाषा पर असर नहीं डाला, बल्कि सांस्कृतिक पहचान पर भी प्रभाव डालता है।
इल्तिजा के नेताओं ने बताया कि उन्होंने कई बार सरकार को चेतावनी दी थी कि उर्दू के सिस्टमैटिक रूप से हटाने से सामाजिक और शैक्षणिक असमानता पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि कई सरकारी कर्मचारियों और विद्यार्थियों को अधिकृत दस्तावेजों और परीक्षाओं में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्हें उर्दू में लिखित सामग्री के विकल्प नहीं मिले।
विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का अभिन्न हिस्सा होती है। उन्होंने कहा कि यदि उर्दू जैसे भाषाओं को सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों से हटाया जाता है, तो इसका असर केवल भाषाई ज्ञान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता पर भी असर डालता है।
इल्तिजा ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि उर्दू भाषा को जम्मू-कश्मीर की शिक्षा प्रणाली, प्रशासनिक कार्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में फिर से शामिल किया जाए। उनका कहना है कि यह कदम भाषाई अधिकारों की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए जरूरी है।
संगठन ने यह भी चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उर्दू के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो सामाजिक आंदोलनों और प्रदर्शन के जरिए आवाज उठाई जाएगी।
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