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जम्मू और कश्मीर
उमर अब्दुल्ला को बड़ा राजनीतिक झटका, श्रीनगर सांसद रुहुल्लाह मेहदी ने किया इस्तीफे का ऐलान
Ratna Netam
3 Nov 2026 3:19 PM IST

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श्रीनगर : 3 नवंबर 2026। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मंगलवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। श्रीनगर लोकसभा सीट से सांसद और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) के वरिष्ठ नेता आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने पार्टी और संसद की सदस्यता छोड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने अपने पिता आगा सैयद मेहदी की 26वीं पुण्यतिथि पर यह फैसला सार्वजनिक किया। अनुच्छेद 370 की बहाली और पार्टी के चुनावी वादों को लेकर लंबे समय से चल रहे मतभेदों के बीच उनके इस कदम को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।आगा रुहुल्लाह मेहदी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह 3 नवंबर को नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्राथमिक सदस्यता और श्रीनगर लोकसभा सीट से इस्तीफा देंगे। उनके कार्यालय ने 30 अक्टूबर को सोशल मीडिया के माध्यम से इस निर्णय की जानकारी दी थी। उन्होंने अपने पिता की पुण्यतिथि को इस फैसले के लिए चुना, जिसे राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पिता की पुण्यतिथि पर लिया बड़ा फैसला
आगा रुहुल्लाह मेहदी के पिता आगा सैयद मेहदी जम्मू-कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक नेताओं में शामिल थे। वर्ष 2000 में एक आतंकवादी हमले में उनकी हत्या कर दी गई थी।अपने पिता की 26वीं पुण्यतिथि पर रुहुल्लाह ने बडगाम के बेहिश्त-ए-जहरा पार्क में आयोजित कार्यक्रम के दौरान लोगों को संबोधित करने की योजना बनाई थी।रुहुल्लाह ने इस तारीख को अपने राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए चुना। उनका कहना रहा है कि वह जनता से किए गए वादों और अपने राजनीतिक सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकते।उनके इस्तीफे की घोषणा के बाद जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर गहराए मतभेद
आगा रुहुल्लाह मेहदी और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व के बीच मतभेदों की सबसे बड़ी वजह जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 की बहाली का मुद्दा रहा है।अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त कर दिए थे। इसके बाद तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, में विभाजित कर दिया गया था।नेशनल कॉन्फ्रेंस लंबे समय से जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली की मांग करती रही है। हालांकि, रुहुल्लाह का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद पार्टी नेतृत्व ने इस मुद्दे पर अपने पुराने रुख को कमजोर कर दिया।उनका मानना है कि केवल पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पर्याप्त नहीं है। जम्मू-कश्मीर के लोगों के संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर भी स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए।
फारूक अब्दुल्ला को पहले ही लिख चुके थे पत्र
इस विवाद की पृष्ठभूमि अगस्त 2026 में ही तैयार हो गई थी, जब रुहुल्लाह ने नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला को पत्र लिखकर पार्टी की राजनीतिक दिशा पर गंभीर सवाल उठाए थे।पत्र में उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी अपने चुनावी वादों से पीछे हट रही है और अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर अपेक्षित राजनीतिक प्रयास नहीं कर रही।उन्होंने यह भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।रुहुल्लाह ने उस समय स्पष्ट संकेत दिया था कि यदि पार्टी नेतृत्व अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करता, तो वह इस्तीफा देने से पीछे नहीं हटेंगे।
उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए चुनौती
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार के लिए रुहुल्लाह का फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में पार्टी शासन और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दे रही है, जबकि रुहुल्लाह जैसे नेताओं का मानना है कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की बहाली को राजनीतिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए।रुहुल्लाह ने पार्टी नेतृत्व पर जनता की उम्मीदों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया है।उन्होंने नेतृत्व की कार्यशैली की आलोचना करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को जनता के विश्वास और चुनावी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए।हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अन्य नेताओं ने पार्टी में गंभीर संकट की आशंकाओं को खारिज किया है। जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्री जावेद राणा ने हाल में कहा था कि पार्टी मजबूत है और किसी एक नेता के जाने से संगठन की स्थिरता प्रभावित नहीं होगी।
श्रीनगर लोकसभा सीट पर राजनीतिक असर
आगा रुहुल्लाह मेहदी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे।वह कश्मीर की राजनीति में प्रभावशाली शिया नेताओं में गिने जाते हैं। बडगाम और आसपास के क्षेत्रों में उनका राजनीतिक तथा सामाजिक प्रभाव माना जाता है।उनके लोकसभा सदस्यता छोड़ने से श्रीनगर सीट पर उपचुनाव की स्थिति बन सकती है। हालांकि, इसके लिए संसद की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इस्तीफे का स्वीकार होना आवश्यक है।लोकसभा के नियमों के अनुसार, किसी सांसद का इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद ही सीट रिक्त होती है।इसलिए इस्तीफे की घोषणा और सदस्यता समाप्त होने की औपचारिक प्रक्रिया के बीच अंतर महत्वपूर्ण है।
क्या जम्मू-कश्मीर में बदलेंगे राजनीतिक समीकरण?
रुहुल्लाह का फैसला जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर अनुच्छेद 370 और पूर्ण राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर मतभेद भविष्य में पार्टी की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।यदि रुहुल्लाह स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता अपनाते हैं, तो इसका प्रभाव विशेष रूप से श्रीनगर और बडगाम क्षेत्र की राजनीति में दिखाई दे सकता है।हालांकि, उन्होंने भविष्य में किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होने या नया संगठन बनाने की किसी निश्चित योजना की पुष्टि नहीं की है।उनकी अगली राजनीतिक रणनीति को लेकर स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है।
जनता से किए वादों को बताया सबसे अहम
रुहुल्लाह लगातार यह कहते रहे हैं कि श्रीनगर की जनता ने उन्हें केवल संसद में प्रतिनिधित्व करने के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों की आवाज उठाने के लिए चुना था।उनका तर्क है कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधि जनता से किए गए वादों को पूरा करने में असफल रहते हैं, तो उन्हें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।इसी विचार के आधार पर उन्होंने पार्टी और लोकसभा सदस्यता छोड़ने का निर्णय लेने की बात कही है।फिलहाल उनके कदम ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर राजनीतिक मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि रुहुल्लाह किस राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ते हैं और उनके फैसले का जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ता है।संपादकीय नोट: 3 नवंबर को इस्तीफे की घोषणा की खबर प्रकाशित हुई है। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इस्तीफा स्वीकार किए जाने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए औपचारिक रूप से सीट रिक्त होने का दावा करना अभी उचित नहीं होगा।
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