हिमाचल प्रदेश

हेल्थ एजुकेटर्स के पक्ष में फैसला सरकार की अधिसूचना रद्द

Ratna Netam
8 Oct 2026 6:41 PM IST
हेल्थ एजुकेटर्स के पक्ष में फैसला सरकार की अधिसूचना रद्द
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत 58 हेल्थ एजुकेटर्स के वेतनमान से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इन कर्मचारियों को 1 अक्टूबर 2012 से संशोधित वेतनमान का लाभ दिया जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति के माध्यम से मिलने वाले उच्च पद का वेतनमान उसके निचले फीडर कैडर के वेतनमान से कम या उसके बराबर नहीं रखा जा सकता। हाई कोर्ट ने वित्त विभाग की 30 जनवरी 2016 की अधिसूचना को संबंधित कर्मचारियों के मामले में रद्द कर दिया है। इस अधिसूचना के तहत हेल्थ एजुकेटर्स को 1 फरवरी 2016 से बढ़ा हुआ ग्रेड पे दिया गया था। अदालत ने इस व्यवस्था को मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 के विपरीत माना है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन निर्धारण में पदों की जिम्मेदारियों, सेवा शर्तों और पदोन्नति की व्यवस्था का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि कोई कर्मचारी पदोन्नति के बाद उच्च पद पर पहुंचता है, तो उसे निचले पद के बराबर या उससे कम वेतनमान देना उचित नहीं माना जा सकता।यह मामला स्वास्थ्य विभाग में हेल्थ एजुकेटर के पद पर कार्यरत कर्मचारियों और उनके फीडर कैडर के वेतनमान में उत्पन्न विसंगति से संबंधित था। कर्मचारियों ने अदालत में दलील दी थी कि उनके पद को पदोन्नति वाला उच्च पद माना गया है, लेकिन उन्हें निचले पद के कर्मचारियों के बराबर ग्रेड पे दिया जा रहा था।
58 हेल्थ एजुकेटर्स को मिला हाई कोर्ट से लाभ
मामले में याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत हेल्थ एजुकेटर्स को संशोधित वेतनमान का लाभ 1 फरवरी 2016 से दिया गया था। कर्मचारियों की मांग थी कि उन्हें यह लाभ 1 अक्टूबर 2012 से मिलना चाहिए।याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मल्टीपर्पस हेल्थ सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत कर्मचारियों को 1 अक्टूबर 2012 से संशोधित ग्रेड पे दिया गया था, जबकि उनसे उच्च पद पर कार्यरत हेल्थ एजुकेटर्स को यही लाभ बाद की तारीख से उपलब्ध कराया गया।इस कारण दोनों पदों के बीच वेतन संबंधी असमानता पैदा हो गई थी। कर्मचारियों ने इसे अनुचित बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी।
वित्त विभाग की 2016 की अधिसूचना रद्द
हाई कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और संबंधित सेवा नियमों का अध्ययन करने के बाद वित्त विभाग की 30 जनवरी 2016 की अधिसूचना को संबंधित हिस्से में रद्द कर दिया।इस अधिसूचना के तहत हेल्थ एजुकेटर्स को 10,300 से 34,800 रुपये के वेतन बैंड के साथ 4,200 रुपये ग्रेड पे का लाभ 1 फरवरी 2016 से दिया गया था।अदालत ने पाया कि हेल्थ एजुकेटर्स के फीडर कैडर में शामिल कर्मचारियों को यही ग्रेड पे पहले से दिया जा रहा था। ऐसे में पदोन्नति वाले पद को उसी स्तर पर रखना उचित नहीं था।न्यायालय ने कहा कि सरकार को वेतन निर्धारण का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल संवैधानिक समानता और निर्धारित सेवा नियमों के अनुरूप होना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लेख किया। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार के मामलों में अवसर की समानता से संबंधित है।अदालत ने कहा कि किसी उच्च पद को बिना उचित आधार निचले पद के बराबर वेतनमान देना मनमाना निर्णय माना जा सकता है।पीठ ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति वाले पद और फीडर कैडर के बीच जिम्मेदारियों तथा प्रशासनिक स्थिति में अंतर होता है। यदि उच्च पद के लिए अलग योग्यता, भर्ती प्रक्रिया और जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं, तो वेतन निर्धारण में इन बातों पर विचार करना आवश्यक है।
पदोन्नति और फीडर कैडर में अंतर जरूरी
हेल्थ एजुकेटर्स का पद मल्टीपर्पस हेल्थ सुपरवाइजर के मुकाबले पदोन्नति वाला पद है। सेवा नियमों में दोनों पदों के लिए अलग-अलग योग्यताएं और नियुक्ति प्रक्रियाएं निर्धारित हैं।हाई कोर्ट ने कहा कि केवल वेतन संबंधी अधिसूचना जारी करके पदोन्नति वाले पद की प्रकृति को बदला नहीं जा सकता। इसके लिए संबंधित भर्ती एवं पदोन्नति नियमों में विधिवत संशोधन करना आवश्यक है।अदालत ने यह भी माना कि सरकार किसी पद को पदोन्नति के स्थान पर सामान्य प्लेसमेंट के रूप में नहीं मान सकती, जब तक इसके लिए निर्धारित नियमों में आवश्यक बदलाव नहीं किया गया हो।न्यायालय ने कहा कि कर्मचारियों की सेवा स्थिति और पदों के बीच निर्धारित अंतर को बनाए रखना जरूरी है।
1 अक्टूबर 2012 से मिलेगा वेतनमान का लाभ
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हेल्थ एजुकेटर्स के लिए उचित और अनुपातिक रूप से उच्च ग्रेड पे निर्धारित किया जाए।अदालत के अनुसार, संशोधित वेतनमान की गणना 1 अक्टूबर 2012 से की जाएगी। हालांकि, वास्तविक आर्थिक लाभ की अवधि पर भी न्यायालय ने सीमा निर्धारित की है।फैसले के मुताबिक, वेतन का काल्पनिक निर्धारण 1 अक्टूबर 2012 से होगा, लेकिन वास्तविक वित्तीय लाभ याचिका दाखिल करने से तीन वर्ष पहले यानी 15 सितंबर 2013 से तथा उसके बाद की अवधि के लिए दिए जाएंगे।इसके अतिरिक्त राज्य सरकार को अदालत के निर्देशों का पालन चार सप्ताह के भीतर करने के लिए कहा गया है।
सरकारी कर्मचारियों के वेतन निर्धारण में महत्वपूर्ण फैसला
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य रूप से वेतनमान तय करना सरकार और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का कार्यक्षेत्र है।हालांकि, यदि वेतन निर्धारण में गंभीर त्रुटि, मनमानी या भेदभाव सामने आता है, तो अदालत न्यायिक समीक्षा कर सकती है।इस मामले में न्यायालय ने पाया कि पदोन्नति वाले कर्मचारियों को निचले पद के बराबर वेतनमान देने और संशोधित ग्रेड पे अलग तारीख से लागू करने के लिए पर्याप्त औचित्य प्रस्तुत नहीं किया गया था।अदालत ने संबंधित सेवा नियमों और उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों के आधार पर कर्मचारियों की याचिका स्वीकार की।
राज्य सरकार को चार सप्ताह में करनी होगी कार्रवाई
हाई कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार को संबंधित कर्मचारियों का वेतन दोबारा निर्धारित करना होगा। इसके लिए सरकार को हेल्थ एजुकेटर्स के पद की प्रशासनिक स्थिति और फीडर कैडर के वेतनमान को ध्यान में रखना होगा।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि संशोधित वेतनमान निर्धारित करते समय उच्च पद की स्थिति बरकरार रहनी चाहिए।इस आदेश से प्रभावित कर्मचारियों को वेतन निर्धारण में सुधार का लाभ मिलेगा। हालांकि, प्रत्येक कर्मचारी को मिलने वाली वास्तविक राशि की गणना संबंधित सेवा रिकॉर्ड और न्यायालय द्वारा निर्धारित अवधि के अनुसार की जाएगी।फिलहाल हाई कोर्ट के फैसले से 58 हेल्थ एजुकेटर्स को राहत मिली है। राज्य सरकार को अब अदालत के निर्देशों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।यह निर्णय सरकारी सेवाओं में पदोन्नति, वेतनमान और समानता से जुड़े विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बन सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि उच्च पद के वेतनमान को उसके फीडर कैडर से कम या समान रखने की व्यवस्था बिना उचित कानूनी आधार के स्वीकार्य नहीं है।
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