हिमाचल प्रदेश

माइनिंग फंड के इस्तेमाल पर उठे सवाल, हाई कोर्ट सख्त

Ashish verma
8 Oct 2026 4:38 PM IST
माइनिंग फंड के इस्तेमाल पर उठे सवाल, हाई कोर्ट सख्त
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए निर्धारित माइनिंग फंड के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) की धनराशि के उपयोग, विकास कार्यों में अनियमितताओं और खनन प्रभावित लोगों की अनदेखी का मामला न्यायिक जांच के दायरे में चर्चा का विषय बना हुआ है। केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, इस विशिष्ट नोटिस के आदेश की प्रति और सुनवाई की तारीख की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं हो सकी है।
मामले का मुख्य मुद्दा यह है कि जिन इलाकों में खनन गतिविधियां संचालित होती हैं और जहां रहने वाले लोगों को इनके कारण विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वहां विकास के लिए निर्धारित धनराशि का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। खनन प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।
हिमाचल प्रदेश में खनिज संसाधनों के दोहन से प्रभावित लोगों के कल्याण के लिए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट की व्यवस्था लागू है। इसके अंतर्गत मिलने वाली राशि का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्राथमिकता देना और स्थानीय निवासियों की आवश्यकताओं को पूरा करना है। हालांकि, इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट में कई गंभीर कमियां सामने आई हैं।
कैग की अनुपालन ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के चार जांच किए गए जिलों में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट को कुल 239.21 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे। इनमें से केवल 86.56 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जबकि कार्यान्वयन एजेंसियों को महज 47.03 करोड़ रुपये जारी किए गए। यह प्राप्त राशि का लगभग 19.66 प्रतिशत था। इन आंकड़ों से खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए उपलब्ध धनराशि के सीमित उपयोग की स्थिति सामने आती है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ जिलों में खनन प्रभावित क्षेत्रों और प्रभावित व्यक्तियों की पहचान करने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं की गई। सोलन और ऊना जिलों में जुलाई 2024 तक प्रभावित क्षेत्रों और लोगों की पहचान के लिए आवश्यक प्रक्रिया नहीं की गई थी। वहीं बिलासपुर और शिमला जिलों में प्रभावित क्षेत्रों की पहचान में कई वर्षों का विलंब हुआ।
खनन प्रभावित व्यक्तियों की पहचान नहीं होने के कारण यह सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है कि विकास योजनाओं का वास्तविक लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं। किसी भी कल्याणकारी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लाभार्थियों की पहचान और उनकी जरूरतों का आकलन महत्वपूर्ण माना जाता है।
कैग की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जांच किए गए जिलों में कई परियोजनाओं की स्वीकृति और धनराशि के आवंटन की प्रक्रिया में कमियां थीं। कुछ परियोजना प्रस्तावों को पर्याप्त कारण स्पष्ट किए बिना अस्वीकार किया गया। इसके अलावा निर्धारित प्राथमिकताओं के अनुसार धनराशि का वितरण नहीं किए जाने का मुद्दा भी सामने आया।
प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के तहत खनन प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, पर्यावरण संरक्षण और आजीविका जैसी बुनियादी जरूरतों को महत्व दिया जाता है। इसके बावजूद यदि विकास परियोजनाओं की स्वीकृति और क्रियान्वयन में देरी होती है, तो संबंधित क्षेत्र के निवासियों को योजनाओं का लाभ मिलने में बाधा आ सकती है।
खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह धनराशि विशेष महत्व रखती है। खनन के दौरान धूल, परिवहन गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए नियोजित विकास कार्यों की जरूरत होती है।
कैग ने लाभार्थियों के बीच किए गए सर्वेक्षण में भी महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किए। कुल 1,082 लाभार्थियों के सर्वेक्षण में 96 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें योजना और जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट की जानकारी नहीं थी। वहीं 78 प्रतिशत लोगों ने कहा कि बुनियादी सुविधाओं की जरूरतों के संबंध में उनसे किसी प्रतिनिधि ने परामर्श नहीं किया था। ये आंकड़े स्थानीय समुदाय की भागीदारी और योजना संबंधी जागरूकता की स्थिति को दर्शाते हैं।
इस प्रकार के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सार्वजनिक धन के उपयोग में जवाबदेही और पारदर्शिता का होता है। यदि किसी विकास योजना के लिए धनराशि उपलब्ध है, तो यह सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि उसका इस्तेमाल निर्धारित नियमों और प्राथमिकताओं के अनुरूप किया जाए।
जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट की व्यवस्था केवल धन एकत्रित करने तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से प्रभावित लोगों की जरूरतों की पहचान करना, योजनाएं तैयार करना, विकास कार्यों को मंजूरी देना और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करना भी आवश्यक है।
हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्य में खनन गतिविधियों का पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों से गहरा संबंध है। ऐसे में खनन से प्रभावित समुदायों के लिए तय कल्याणकारी प्रावधानों का प्रभावी पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।
माइनिंग फंड से जुड़े विवाद में केंद्र और राज्य सरकार की जवाबदेही का प्रश्न भी अहम है। हालांकि, संबंधित अदालती आदेश उपलब्ध नहीं होने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायालय ने किन विशिष्ट आरोपों पर जवाब मांगा है और अगली सुनवाई कब निर्धारित की गई है।
फिलहाल कैग की रिपोर्ट में सामने आई अनियमितताएं यह दर्शाती हैं कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों के उपयोग, प्रभावित परिवारों की पहचान और परियोजनाओं की निगरानी में सुधार की आवश्यकता है। वहीं निधि के वास्तविक दुरुपयोग या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।
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