हिमाचल प्रदेश

हिमाचल में 1000 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें बनी खतरा

Kavita2
27 Aug 2026 5:33 PM IST
हिमाचल में 1000 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें बनी खतरा
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हिमाचल प्रदेश : बढ़ती ग्लेशियल झीलों की संख्या ने चिंता बढ़ा दी है। हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण नई झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती हैं। विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए समय रहते निगरानी और सुरक्षा उपायों की जरूरत पर जोर दिया है।

राज्य में ग्लेशियल झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जानकारी के अनुसार, पहले जहां इनकी संख्या करीब 562 थी, वहीं अब यह बढ़कर एक हजार से अधिक हो गई है। बढ़ती झीलों को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि यदि इनमें से किसी झील का जलस्तर अचानक बढ़ा या बांध टूटने जैसी स्थिति बनी तो भारी तबाही हो सकती है।

हिमालय क्षेत्र में तेजी से बदल रहा पर्यावरण

हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर लगातार दिखाई दे रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से जमा होने वाला पानी कई स्थानों पर ग्लेशियल झीलों का रूप ले रहा है।

इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसमें अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहता है, जिससे नदी किनारे बसे क्षेत्रों में भारी नुकसान हो सकता है।

नेपाल आपदा के बाद बढ़ी चिंता

नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद हिमालयी राज्यों में भी चिंता बढ़ गई है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने नेपाल त्रासदी पर दुख व्यक्त करते हुए इसे हिमालयी क्षेत्र में गहराते जलवायु संकट का संकेत बताया।

उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं हमें पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की आवश्यकता की याद दिलाती हैं।

नेपाल में हुई तबाही को देखते हुए हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में भी संभावित खतरों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

विधानसभा में रखा गया दो मिनट का मौन

नेपाल में प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए हिमाचल प्रदेश विधानसभा में दो मिनट का मौन रखा गया।

मुख्यमंत्री और विधानसभा सदस्यों ने मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त की। इस दौरान हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर भी चर्चा हुई।

मानसून सत्र में ग्लेशियल झीलों का मुद्दा उठा

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान ग्लेशियल झीलों की बढ़ती संख्या का मुद्दा उठाया गया। सदस्यों ने कहा कि राज्य में मौजूद इन झीलों की नियमित निगरानी जरूरी है।

विधानसभा में इस बात पर चिंता जताई गई कि यदि समय रहते वैज्ञानिक तरीके से इन झीलों का अध्ययन नहीं किया गया तो भविष्य में गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।

निगरानी और सुरक्षा उपायों की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियल झीलों की पहचान, निगरानी और जोखिम का आकलन करना बेहद जरूरी है। संवेदनशील झीलों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए समय रहते चेतावनी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।

सैटेलाइट तकनीक, ड्रोन सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए ऐसी झीलों की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ रही आपदाएं

पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी राज्यों में बादल फटना, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं बढ़ी हैं। विशेषज्ञ इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, अनियोजित निर्माण और पर्यावरणीय असंतुलन को भी कारण मानते हैं।

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अधिक रहता है, इसलिए मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था जरूरी है।

सरकार ने जताई गंभीरता

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय बदलावों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। सरकार आपदा प्रबंधन और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने के लिए कदम उठा रही है।

उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की जरूरत है।

भविष्य के लिए चेतावनी

हिमाचल प्रदेश में एक हजार से अधिक ग्लेशियल झीलों की मौजूदगी भविष्य के लिए चेतावनी मानी जा रही है। हालांकि, सभी झीलें खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन जिन झीलों में जोखिम अधिक है, उनकी पहचान और निगरानी जरूरी है।

नेपाल जैसी आपदाओं से सबक लेते हुए हिमालयी राज्यों को पहले से तैयार रहने की आवश्यकता है। समय पर कदम उठाने से संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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