हिमाचल प्रदेश

हिमाचल में वायरस का शिकार बने पांच हजार से ज्यादा पशु, पालमपुर में लंपी सैंपल की जांच

Sarita
24 Sept 2022 10:32 AM IST
More than five thousand animals became victims of virus in Himachal, Lampi sample in Palampur
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न्यूज़ क्रेडिट : divyahimachal.com

देश भर में चिंता का सबब बन रही लंपी स्किन बीमारी से प्रदेश के पशु भी प्रभावित हो रहे हैं।

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। देश भर में चिंता का सबब बन रही लंपी स्किन बीमारी से प्रदेश के पशु भी प्रभावित हो रहे हैं। प्रदेश में अब तक पांच हजार से ज्यादा पशु इस बीमारी से मौत का शिकार बन चुके हैं। इसे लेकर प्रदेश सरकार भी चिंतित है और इसे एपेडेमिक घोषित किए जाने के साथ प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा देने की बात भी कही गई है। जानकारी के अनुसार पालमपुर स्थित प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय को पूरे राज्य से ढेलेदार त्वचा रोग (एलएसडी) के नमूनों का परीक्षण करने के लिए अधिकृत किया गया है। जानकारी के अनुसार मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार की अधिसूचना के अनुसार विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग, डा. जीसी नेगी पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान महाविद्यालय को हिमाचल प्रदेश के पशुधन से एलएसडी नमूनों की त्वरित जांच के लिए परीक्षण करने के लिए अधिकृत प्रयोगशाला का दर्जा दिया गया है। प्रदेश कृषि विवि के कुलपति एचके चौधरी ने बताया कि पशु चिकित्सा सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग पशुपालन विभाग, हिमाचल प्रदेश के सहयोग से नमूनों की जांच करने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित है।

यह नामित एलएसडी प्रयोगशाला राज्य में रोग के त्वरित प्रबंधन में मदद करेगी, क्योंकि अब नमूनों को परीक्षण के लिए राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल भेजने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि वे राज्य के पशुपालकों को एलएसडी द्वारा पैदा की गई स्थिति से निपटने के लिए हर तरह से मदद करें। डा. जीसी नेगी पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान महाविद्यालय के डीन डा. मनदीप शर्मा और पशु चिकित्सा सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा. राजेश चहोटा ने बताया कि नमूनों की जांच के लिए पारंपरिक पीसीआर और रीयल-टाइम पीसीआर जैसी संवेदनशील आणविक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। बेहतर रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए क्षेत्र के पशु चिकित्सकों को जल्द से परीक्षण के परिणाम प्रदान करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह क्षेत्र के पशु चिकित्सकों को एलएसडी को नियंत्रित करने और रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप करने में सक्षम करेगा, ताकि पशुधन मालिकों को न्यूनतम वित्तीय नुकसान हो।
180 मवेशियों की मौत, 1628 नए मामले
प्रदेश में इनसानों पर लगाम, लेकिन मवेशी अब पूरी तरह से निशाने पर आ गए है। बेशक प्रदेश में कोरोना वायरस पर लगाम लग गई है, लेकिन अब सूबे में लंपी वायरस बेकाबू हो गया है। आए दिन मवेशी न केवल काल का ग्रास बन रहे हैं, अपितु नए मामले भी धड़ाधड़ आ रहे है। प्रदेश में शुक्रवार को लंपी वायरस से 180 पशुओं की मौत हो गई है, जबकि 1628 नए मामले लंपी वायरस के सामने आए है। प्रदेश में अभी भी 37412 पशु इस बीमारी से ग्रसित चले हुए हैं। अब तक लंपी वायरस के 89273 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि 5199 पशुओं की मौत हो चुकी है। प्रदेश में 2400638 मवेशी इस बीमारी से संभावित ग्रसित है, जबकि अभी तक प्रदेश में 241978 पशुओं का ही टीकाकरण हो सका है। वहीं 180 पशुओं की मौत में सिरमौर में 38, शिमला में 15, सोलन में 29, चंबा में 10, हमीरपुर में 3, बिलासपुर में 7, ऊना में 20, मंडी में 6, कांगड़ा में 52 मौतें हुई हैं। 1628 आए नए मामलों में सिरमौर में 279, शिमला में 127, सोलन में 229, चंबा में 186, हमीरपुर में 38, बिलासपुर में 50, ऊना में 62, मंडी में 255, कांगड़ा में 402 मामले शामिल है। प्रदेश भर में एक्टिव चल रहे 37412 मामलों में सिरमौर में 5185, शिमला में 2198, सोलन में 4822, चंबा में 1892, हमीरपुर में 606, बिलासपुर में 773, ऊना में 3933, कुल्लू में 3, मंडी में 3956, कांगड़ा में 14044 मामले शामिल हैं।
चमड़ी रोग की रोकथाम-जागरूकता को सशक्त प्रयास
प्रदेश में गोवंश में फैल रहे लंपी चमड़ी रोग के बारे में पशुपालकों को जागरूक किया जा रहा है। पशुपालन विभाग के एक प्रवक्ता ने बताया कि अभी तक 650 शिविरों का आयोजन कर 27500 किसानों को इस बीमारी के बारे में जानकारी प्रदान की गई है। उन्होंने कहा कि पशुपालन विभाग द्वारा स्थिति पर पूर्ण रूप से नजर रखी जा रही है तथा विभिन्न स्तरों पर समीक्षा बैठकें निरंतर आयोजित की जा रही हैं। सभी प्रभावित जिलों में विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की टीमें बनाई गई हैं, जो रोगी पशुओं को तुरंत उपचार उपलब्ध करवा रही हैं। प्रत्येक जिला के सहायक निदेशक, परियोजना को जिला स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है।
निदेशालय स्तर पर भी टास्क फोर्स और वार रूम स्थापित किया गया है, जिसका दूरभाष नंबर 0177-2650938 है। उन्होंने कहा कि 22 सितंबर, 2022 तक प्रदेश के नौ जिलों में 87645 पशु इस रोग से ग्रसित पाए गए हैं। 5199 गोवंश की मृत्यु दर्ज की गई है तथा अब तक 45425 पशु इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं। प्रदेश में अभी तक इस रोग की संक्रमण दर 3.65 प्रतिशत तथा मृत्यु दर पांच प्रतिशत के करीब है। प्रदेश में इस बीमारी के लिए संवेदनशील पशुओं की कुल संख्या 2400638 है। इस बीमारी से प्रभावित क्षेत्रों के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में रोग प्रतिरोधी टीकाकरण किया जा रहा है तथा अब तक 237748 गायों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। सभी जिलों में रोगी पशुओं के उपचार के लिए पर्याप्त मात्रा में दवाइयां उपलब्ध हैं। प्रदेश में लंपी चमड़ी रोग समाप्त होने तक विभाग के सभी तकनीकी अधिकारियों व कर्मचारियों तबादलों पर रोक लगाई गई है।

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प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय ने गांठदार त्वचा रोग (लंपी स्किन रोग) पर जागरूकता अभियान शुरू किया है। लंपी स्किन रोग के विभिन्न पहलुओं पर पशुपालकों और आम जनता के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए डा. जीसी नेगी पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान महाविद्यालय के पशु चिकित्सा वैज्ञानिकों की एक समिति का गठन किया गया है। पशुपालकों में लंपी स्किन रोग को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। इन भ्रांतियों को लेकर विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सक इस कठिन परिस्थिति में किसानों को विशेषज्ञ राय और मार्गदर्शन देकर स्थिति से निपटने में मदद करेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार लंपी स्किन रोग एक संक्रामक और अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो लंपी स्किन डिजीज वायरस (एलएसडीवी) के कारण होता है। यह रोग एक पशु से दूसरे को फैलता है, जिसमें सीधे तौर पर या उस वस्तु से सीधा संपर्क होने पर पशु रोग की चपेट में आ जाता है, जहां बीमारीयुक्त पशु हो। इतना ही नहीं, संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क में या परोक्ष रूप से आने वाले खून चूसने वाले मक्खियों, चीचड़ों, पिस्सू और मच्छरों जैसे काटने वाले कीड़े इस बीमारी को अलग-अलग जगहों पर फैलाते हैं। संक्रमित पशुओं का दूध उचित रूप से उबालने के बाद मानव उपभोग के लिए सुरक्षित होता है।
यह भी सिफारिश की जाती है कि संक्रमित पशुओं को आसानी से ठीक होने के लिए हरा, मुलायम और पौष्टिक चारा दिया जाना चाहिए। विशेषज्ञ समिति के समन्वयक डा. रविंद्र कुमार ने किसानों को सलाह दी है कि वे स्थानीय पशु चिकित्सा अधिकारी से संपर्क कर अपने स्वस्थ पशुओं को एलएसडी का टीका लगवाएं। सभी मवेशियों और भैंसों को उपलब्ध 'गोट पॉक्स' के टीके (चार महीने और उससे अधिक की उम्र में मवेशी और भैंस) के साथ टीका लगाया जाना चाहिए। प्रभावित पशुओं का टीकाकरण नहीं किया जाना चाहिए। कुलपति प्रो. एचके चौधरी ने समिति को सक्रिय रूप से काम करने और टेलीफोन परामर्श, रेडियो और टीवी वार्ता और समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित करने और गांठदार त्वचा रोग के विभिन्न पहलुओं पर पंफलेट तैयार करने के माध्यम से राज्य के पशुपालकों के संपर्क में रहने का निर्देश दिया है। समिति राज्य के पशुपालन विभाग के साथ निकट संपर्क में काम करेगी।
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