- Home
- /
- राज्य
- /
- हिमाचल प्रदेश
- /
- कम बाजार भाव और महंगे...
कम बाजार भाव और महंगे कीटनाशकों ने बढ़ाई टमाटर किसानों की मुश्किलें

सोलन। हिमाचल प्रदेश में टमाटर की खेती करने वाले किसानों को इस सीजन दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक ओर बाजार में टमाटर के दाम उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कीटनाशकों और फसल सुरक्षा से जुड़ी दवाओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि महंगे कीटनाशक खरीदने के बावजूद कई बार उनका अपेक्षित असर नहीं हो रहा, जिससे फसल बचाने की लागत और बढ़ रही है।
सोलन की एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमिटी (APMC) में अपनी उपज बेचने पहुंच रहे किसानों के मुताबिक, टमाटर की खेती में इस समय सबसे बड़ी चुनौती लागत और आमदनी के बीच बढ़ता अंतर है। खेती पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन बाजार में उपज का भाव उस अनुपात में नहीं मिल रहा। ऐसे में किसानों के लिए टमाटर की फसल से लागत निकालना भी मुश्किल होता जा रहा है।
किसानों का कहना है कि टमाटर की फसल को विभिन्न प्रकार के कीटों और रोगों से बचाने के लिए कई बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है। इसके लिए उन्हें महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। लेकिन कई किसानों के अनुभव में कुछ कीटनाशक सफेद मक्खी और माइट्स जैसे कीटों पर प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं। इससे किसानों को दोबारा दवा खरीदनी और उसका छिड़काव करना पड़ता है, जिससे खेती का खर्च और बढ़ जाता है।
सफेद मक्खी और माइट्स से फसल को नुकसान
किसान पाल सिंह ठाकुर ने बताया कि बाजार में उपलब्ध कुछ कीटनाशक सफेद मक्खी और माइट्स जैसे कीटों पर बेअसर साबित हुए हैं। उनके मुताबिक इन कीटों ने टमाटर के साथ-साथ खीरा और बीन्स जैसी सब्जियों की फसलों को भी नुकसान पहुंचाया है।
किसानों के अनुसार सफेद मक्खी और माइट्स का प्रकोप बढ़ने पर पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और फसल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में किसान समय रहते कीट नियंत्रण के लिए दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यदि कीटनाशक प्रभावी नहीं होता तो फसल को नुकसान के साथ-साथ किसान का अतिरिक्त खर्च भी बढ़ जाता है।
पाल सिंह ठाकुर का कहना है कि मुंबई की एक कंपनी के कुछ कीटनाशकों का इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें सफेद मक्खी और माइट्स से अपेक्षित राहत नहीं मिली। किसानों का आरोप है कि उन्हें दवाओं पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है, लेकिन कई बार परिणाम संतोषजनक नहीं मिलते।
बढ़ती लागत ने बिगाड़ा गणित
टमाटर की खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, परिवहन और कीटनाशक सहित कई मदों पर खर्च होता है। किसानों का कहना है कि पिछले कुछ समय में खेती से जुड़ी लागत में लगातार वृद्धि हुई है। विशेष रूप से कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों की कीमत बढ़ने से सब्जी उत्पादकों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है।
किसानों के मुताबिक फसल को कीटों से बचाने के लिए समय-समय पर दवा का छिड़काव जरूरी होता है। यदि मौसम अनुकूल न हो या कीटों का प्रकोप अधिक हो जाए तो छिड़काव की संख्या बढ़ जाती है। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है।
दूसरी ओर, बाजार में टमाटर का भाव कमजोर रहने पर किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ती है। इससे उत्पादन पर किया गया खर्च और बाजार से मिलने वाली आय के बीच अंतर कम हो जाता है। किसानों का कहना है कि यदि बाजार भाव लागत के अनुरूप नहीं रहा तो आने वाले समय में टमाटर की खेती उनके लिए आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकती है।
गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर
किसानों के सामने केवल लागत बढ़ने की समस्या नहीं है, बल्कि कीटों के प्रकोप से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित होने की भी चिंता है। टमाटर जैसी नकदी फसल में फल की गुणवत्ता बाजार भाव तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि कीटों या रोगों के कारण फल की गुणवत्ता खराब होती है तो किसानों को मंडी में बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी कम हो जाती है।
सोलन क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान सब्जियों की खेती पर निर्भर हैं। टमाटर के अलावा खीरा, बीन्स और अन्य सब्जियां भी किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसे में एक ही प्रकार के कीटों का कई फसलों को प्रभावित करना किसानों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
किसानों ने प्रभावी दवाओं की मांग उठाई
किसानों ने मांग की है कि कृषि विभाग बाजार में उपलब्ध कीटनाशकों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता की जांच करे। उनका कहना है कि यदि कोई दवा निर्धारित मानकों के मुताबिक काम नहीं कर रही है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। किसानों को ऐसी दवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो संबंधित कीटों पर प्रभावी हों और जिनकी गुणवत्ता सुनिश्चित हो।
किसानों का यह भी कहना है कि उन्हें कीटनाशकों के सही इस्तेमाल और फसल में मौजूद कीटों की पहचान को लेकर तकनीकी सलाह की जरूरत है। कई बार किसान अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सही कीट की पहचान और उचित दवा की जानकारी नहीं होने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते।
मंडी भाव पर भी नजर
इस बीच किसानों की निगाहें सोलन APMC में मिलने वाले टमाटर के भाव पर टिकी हैं। किसान चाहते हैं कि उन्हें उनकी उपज का ऐसा मूल्य मिले जिससे उत्पादन लागत निकलने के साथ उचित मुनाफा भी हो सके। उनका कहना है कि अगर बाजार भाव लगातार कम रहा और खेती की लागत बढ़ती गई तो इसका असर अगले सीजन में टमाटर की खेती के रकबे पर भी पड़ सकता है।
किसानों का कहना है कि सरकार को एक तरफ कृषि रसायनों की कीमत और गुणवत्ता पर निगरानी बढ़ानी चाहिए, वहीं दूसरी ओर किसानों को बाजार में उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था करनी चाहिए।
फिलहाल सोलन के टमाटर उत्पादकों के सामने कम बाजार भाव, बढ़ती उत्पादन लागत और कीटों के बढ़ते प्रकोप की तिहरी चुनौती है। किसानों को उम्मीद है कि कृषि विभाग और संबंधित एजेंसियां उनकी समस्याओं पर ध्यान देंगी और प्रभावी कीटनाशकों की उपलब्धता के साथ-साथ फसल के उचित बाजार मूल्य की दिशा में भी ठोस कदम उठाएंगी।





