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हिमाचल प्रदेश
संस्कृत को भारत की ज्ञान परंपरा में मिले उचित स्थान, राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने किया आह्वान
Ratna Netam
31 Oct 2026 9:56 PM IST

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नूरपुर। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता ने भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में संस्कृत भाषा को उसका उचित स्थान वापस दिलाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, दर्शन और हजारों वर्षों से संचित ज्ञान की आधारशिला है। वेदों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जरूरत इस बात की है कि इस ज्ञान को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और तकनीक के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।राज्यपाल कविंदर गुप्ता शनिवार, 31 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में नूरपुर के निकट मल्कवाल स्थित के.बी.वी.एम. इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय संस्कृत भारती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने संस्कृत भारती के पदाधिकारियों, आयोजकों और देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे विद्वानों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार और इसे आम लोगों की बोलचाल से जोड़ने के प्रयासों की सराहना की।
संस्कृत में संरक्षित है भारत का प्राचीन ज्ञान
राज्यपाल ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का विशाल भंडार संस्कृत साहित्य में सुरक्षित है। वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि इनमें दर्शन, विज्ञान, नैतिकता, जीवन मूल्यों और मानवीय व्यवहार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी समाहित हैं।उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से इन ग्रंथों ने भारतीय समाज की बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना को दिशा दी है। संस्कृत भाषा के माध्यम से ज्ञान की अनेक शाखाओं का विकास हुआ और विभिन्न पीढ़ियों तक विचारों एवं अनुभवों का आदान-प्रदान संभव हुआ।कविंदर गुप्ता ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है। इसे केवल प्राचीन भाषा या शैक्षणिक विषय के रूप में सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसके साहित्य में मौजूद ज्ञान और विचारों को वर्तमान समय की जरूरतों के अनुसार समझने और उपयोग में लाने की आवश्यकता है।
प्राचीन विद्वानों और वैज्ञानिकों के योगदान को मिले पहचान
राज्यपाल ने भारत के प्राचीन विद्वानों और वैज्ञानिकों के योगदान को उचित पहचान देने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने आर्यभट्ट, पाणिनि, सुश्रुत और भास्कराचार्य जैसे महान विद्वानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास और शिक्षा व्यवस्था में उनके योगदान को प्रमुखता से स्थान मिलना चाहिए।उन्होंने कहा कि इन विद्वानों ने गणित, खगोल विज्ञान, भाषा विज्ञान, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी उपलब्धियों का व्यवस्थित अध्ययन और शोध आज भी नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।राज्यपाल ने तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की शिक्षा परंपरा का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। इन संस्थानों ने कभी दुनिया भर के विद्यार्थियों और विद्वानों को आकर्षित किया था।उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शैक्षणिक उपलब्धियों और ज्ञान परंपराओं को आधुनिक शोध के माध्यम से सामने लाने की जरूरत है, ताकि नई पीढ़ी अपने देश के बौद्धिक इतिहास से परिचित हो सके।
एआई और आधुनिक तकनीक से जुड़े संस्कृत अध्ययन
कविंदर गुप्ता ने संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डिजिटल प्लेटफॉर्म और भाषा प्रौद्योगिकी ने ज्ञान के प्रसार के नए रास्ते खोले हैं।उन्होंने सुझाव दिया कि संस्कृत के प्राचीन साहित्य का डिजिटलीकरण किया जाना चाहिए। इसके साथ ही आधुनिक तकनीकी माध्यमों से संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन, अनुवाद और शोध आसान बनाया जा सकता है।राज्यपाल ने कहा कि गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और अन्य विषयों से संबंधित संस्कृत साहित्य में उपलब्ध ज्ञान का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और शिक्षाविदों को इस दिशा में मिलकर काम करना चाहिए।उन्होंने कहा कि संस्कृत में उपलब्ध महत्वपूर्ण जानकारियों को आधुनिक शोध के साथ जोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर समझने और उसकी उपयोगिता का अध्ययन करने के अवसर बढ़ेंगे।
युवाओं को संस्कृत से जोड़ने की जरूरत
राज्यपाल ने युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को संस्कृत को केवल परीक्षा में पढ़े जाने वाले विषय के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान की महत्वपूर्ण विरासत के रूप में अपनाना चाहिए।उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के भीतर अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के प्रति रुचि विकसित करना आवश्यक है। इसके लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।उन्होंने संस्कृत भारती के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि संस्था संस्कृत को पारंपरिक विद्वत्ता तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों के बीच पहुंचाने का कार्य कर रही है। संस्कृत को दैनिक जीवन और सामान्य बातचीत का हिस्सा बनाने के प्रयास भाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।राज्यपाल ने कहा कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। दोनों का संतुलित समन्वय देश की प्रगति के लिए आवश्यक है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी सुरक्षित रखना होगा।
हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान का भी किया उल्लेख
अपने संबोधन में राज्यपाल ने हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई विरासत का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश की लोक परंपराएं, स्थानीय बोलियां और सांस्कृतिक धरोहर भारतीय संस्कृति को विविधता प्रदान करती हैं।उन्होंने कहा कि संस्कृत का प्रभाव हिमाचल प्रदेश की स्थानीय बोलियों और भाषाई परंपराओं में भी देखने को मिलता है। राज्य की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय भाषाओं और संस्कृत के अध्ययन को बढ़ावा देना जरूरी है।संगोष्ठी में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने इस आयोजन को भारत की विविधता में एकता की भावना का जीवंत उदाहरण बताया। कार्यक्रम में संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष रमेश कुमार पांडेय, अखिल भारतीय महामंत्री सत्यनारायण भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा, पूर्व मंत्री एवं स्वागत समिति के अध्यक्ष राकेश पठानिया, पूर्व भटियात विधायक विक्रम जरयाल सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।राज्यपाल ने विश्वास जताया कि इस तरह के आयोजन संस्कृत भाषा के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने में मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि संस्कृत का संरक्षण केवल अतीत को सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक पहचान और भविष्य की बौद्धिक प्रगति से भी जुड़ा हुआ विषय है।
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