
चंडीगढ़। हरियाणा के शहरी क्षेत्रों में पानी की नई दरों को लेकर प्रस्तावित व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है। अब पानी का मासिक खर्च केवल उपभोक्ता द्वारा की गई पानी की खपत पर निर्भर नहीं रहेगा। घर में पानी का मीटर लगा है या नहीं और संबंधित प्लॉट का आकार कितना है, ये दोनों कारक पानी के बिल को प्रभावित करेंगे। नई व्यवस्था के तहत मीटर वाले घरेलू कनेक्शनों के लिए पानी की खपत के आधार पर अलग-अलग स्लैब निर्धारित किए गए हैं, जबकि बिना मीटर वाले कनेक्शनों में प्लॉट के आकार को बिल तय करने का आधार बनाया जाएगा।
सरकार की प्रस्तावित नई व्यवस्था का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में पानी की खपत को व्यवस्थित करना और बिलिंग प्रणाली को अधिक स्पष्ट बनाना है। नई दरों के तहत हर साल पानी के शुल्क में पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी प्रस्तावित की गई है। शहरी निकाय विभाग द्वारा निर्धारित पानी की दरें हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) की ओर से निर्धारित दरों के बराबर होंगी।
नई व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव मीटर और बिना मीटर वाले कनेक्शनों को लेकर है। जिन घरेलू उपभोक्ताओं के घरों में पानी के मीटर लगे हैं, उनका बिल वास्तविक खपत के आधार पर तैयार किया जाएगा। इसके लिए पानी की खपत को अलग-अलग स्लैब में बांटा गया है। यानी जितनी अधिक खपत होगी, उसी के अनुसार उपभोक्ता को शुल्क देना होगा।
इस व्यवस्था से कम पानी इस्तेमाल करने वाले परिवारों को अपेक्षाकृत कम बिल आने की उम्मीद है, जबकि अधिक पानी खर्च करने वाले उपभोक्ताओं को अधिक भुगतान करना पड़ेगा। इससे लोगों को पानी की खपत कम करने और जल संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश भी की जा सकती है।
वहीं, जिन घरेलू कनेक्शनों पर मीटर नहीं लगा है, उनके लिए पानी की वास्तविक खपत का आकलन करना संभव नहीं होगा। ऐसे मामलों में प्लॉट का आकार बिल निर्धारण का प्रमुख आधार बनेगा। इसका अर्थ है कि समान पानी का इस्तेमाल करने वाले दो परिवारों का बिल अलग-अलग हो सकता है, यदि उनके प्लॉट का क्षेत्रफल अलग है।
यह बदलाव खास तौर पर बड़े प्लॉट वाले मकानों के मालिकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। बिना मीटर वाले कनेक्शन में बड़े प्लॉट के लिए निर्धारित शुल्क अधिक हो सकता है, जबकि छोटे प्लॉट के लिए शुल्क अपेक्षाकृत कम रहेगा। सरकार की व्यवस्था में इस तरह पानी के बिल को संपत्ति के आकार से भी जोड़ने की योजना बनाई गई है।
हर साल पांच प्रतिशत बढ़ोतरी प्रस्तावित
नई व्यवस्था में पानी की दरों में हर साल पांच प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित है। इसका सीधा असर आने वाले वर्षों में उपभोक्ताओं के मासिक पानी के बिल पर पड़ेगा। हालांकि, यह बढ़ोतरी निर्धारित शुल्क और संबंधित स्लैब के अनुसार लागू होगी।
हर साल पांच प्रतिशत की वृद्धि का प्रावधान शहरी जलापूर्ति व्यवस्था की लागत में होने वाले बदलाव को ध्यान में रखते हुए किया गया है। पानी की आपूर्ति, पाइपलाइन, रखरखाव, पंपिंग और अन्य सेवाओं पर होने वाले खर्च के कारण स्थानीय निकायों पर वित्तीय दबाव रहता है। नई दरों के जरिए इस व्यवस्था को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बनाने का प्रयास किया जा सकता है।
HSVP की दरों के बराबर होंगी दरें
नई व्यवस्था में शहरी निकाय विभाग द्वारा निर्धारित पानी की दरों को HSVP द्वारा निर्धारित दरों के बराबर रखने का प्रस्ताव है। इससे शहरी क्षेत्रों में पानी के शुल्क में एकरूपता लाने की कोशिश की जाएगी।
अलग-अलग शहरी क्षेत्रों में पानी के शुल्क को लेकर लंबे समय से अलग-अलग व्यवस्था देखने को मिलती रही है। नई नीति के तहत दरों को एक समान आधार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं के लिए पानी की दरों को समझना आसान हो सकता है।
मीटर लगवाने पर जोर
नई व्यवस्था में मीटर वाले कनेक्शनों को वास्तविक खपत से जोड़ना जल प्रबंधन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मीटर होने पर उपभोक्ता द्वारा इस्तेमाल किए गए पानी की मात्रा का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। इससे पानी की बर्बादी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
घरेलू उपभोक्ताओं के लिए खपत आधारित बिलिंग लागू होने से पानी की बचत के प्रति जागरूकता बढ़ने की उम्मीद है। यदि उपभोक्ता जानते हैं कि अधिक पानी इस्तेमाल करने पर बिल भी बढ़ेगा, तो वे पानी की खपत नियंत्रित करने का प्रयास कर सकते हैं।
हालांकि, मीटर व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करना भी सरकार और शहरी निकायों के सामने बड़ी चुनौती होगी। मीटर की उपलब्धता, उसकी रीडिंग, खराब मीटरों को बदलना और बिलिंग सिस्टम में वास्तविक खपत दर्ज करना महत्वपूर्ण होगा।
बिना मीटर वाले उपभोक्ताओं पर अलग असर
बिना मीटर वाले घरेलू कनेक्शनों के लिए प्लॉट का आकार आधार बनने से उपभोक्ताओं के बीच अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। ऐसे परिवार जिनका प्लॉट बड़ा है, लेकिन पानी की वास्तविक खपत कम है, उन्हें नई व्यवस्था में अधिक शुल्क देना पड़ सकता है। दूसरी ओर, छोटे प्लॉट वाले उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम शुल्क का लाभ मिल सकता है।
इसी वजह से उपभोक्ताओं के लिए मीटर आधारित व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है। वास्तविक खपत के आधार पर बिल आने से उपभोक्ता अपने इस्तेमाल के मुताबिक भुगतान कर सकेंगे।
जल संरक्षण पर भी जोर
नई दर व्यवस्था को केवल राजस्व बढ़ाने की नीति के रूप में नहीं देखा जा रहा है। खपत के आधार पर शुल्क तय करने का एक उद्देश्य पानी की बचत को बढ़ावा देना भी हो सकता है। शहरों में लगातार बढ़ती आबादी और पानी की मांग के बीच जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना जरूरी हो गया है।
यदि अधिक खपत पर अधिक शुल्क लागू होता है, तो इससे अनावश्यक पानी की खपत कम करने का आर्थिक प्रोत्साहन मिलेगा। घरों में पाइप से पानी बहता छोड़ना, वाहनों या खुले स्थानों की अत्यधिक धुलाई और अन्य गैर-जरूरी इस्तेमाल को नियंत्रित करने में यह व्यवस्था मददगार हो सकती है।
उपभोक्ताओं की नजर अंतिम दरों पर
नई व्यवस्था लागू होने के बाद उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहेगा कि अलग-अलग खपत स्लैब और प्लॉट आकार के अनुसार वास्तविक दरें कितनी निर्धारित होती हैं। दरों के आधार पर ही यह स्पष्ट होगा कि किस वर्ग के उपभोक्ता पर कितना आर्थिक असर पड़ेगा।
शहरी निकाय विभाग और संबंधित एजेंसियों के लिए यह भी जरूरी होगा कि नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उपभोक्ताओं को इसकी पूरी जानकारी दी जाए। मीटर वाले और बिना मीटर वाले कनेक्शनों की बिलिंग व्यवस्था, खपत के स्लैब और सालाना पांच प्रतिशत वृद्धि के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराने से भ्रम की स्थिति कम होगी।
कुल मिलाकर हरियाणा की प्रस्तावित नई पानी दर व्यवस्था में खपत, मीटर और प्लॉट का आकार तीन महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं। मीटर वाले घरों में वास्तविक पानी की खपत के आधार पर बिल तय होगा, जबकि बिना मीटर वाले कनेक्शनों में प्लॉट के आकार को आधार बनाया जाएगा। साथ ही दरों में हर साल पांच प्रतिशत वृद्धि प्रस्तावित है और शहरी निकाय विभाग की दरें HSVP की निर्धारित दरों के बराबर रखने की योजना है।
नई व्यवस्था से सरकार को पानी की खपत को नियंत्रित करने, बिलिंग में पारदर्शिता लाने और शहरी जलापूर्ति व्यवस्था को आर्थिक रूप से मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इसका वास्तविक असर दरों के अंतिम निर्धारण और व्यवस्था को जमीन पर लागू करने के तरीके पर निर्भर करेगा।





