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हर्बिसाइड-टॉलरेंट Bt (HTBt) कॉटन, एक ऐसी बिना मंज़ूरी वाली जेनेटिकली मॉडिफाइड कॉटन टेक्नोलॉजी है जो किसानों को खरपतवार खत्म करने के लिए फसल पर सीधे ग्लाइफोसेट-बेस्ड हर्बिसाइड का छिड़काव करने की सुविधा देती है। यह एक बार फिर भारत की कॉटन पॉलिसी से जुड़ी बहस के केंद्र में है क्योंकि इसकी खेती औपचारिक रेगुलेटरी सिस्टम के दायरे से बाहर बड़े पैमाने पर फैल गई है।
फेडरेशन ऑफ़ सीड इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (NSAI) द्वारा कराई गई हालिया फील्ड-बेस्ड स्टडी का अनुमान है कि 2025-26 में भारत में कॉटन की खेती वाले कुल इलाके का 24-30 प्रतिशत हिस्सा अनधिकृत जेनेटिकली मॉडिफाइड हाइब्रिड का था, जो लगभग 26.2-29 लाख हेक्टेयर में फैला हुआ था। स्टडी में कॉटन उगाने वाले प्रमुख ज़िलों से इकट्ठा किए गए फील्ड सैंपल में से 72.69 प्रतिशत में हर्बिसाइड-टॉलरेंट जीन पाया गया।
HTBt कॉटन क्या है?
भारत में कमर्शियल तौर पर मंज़ूर Bt कॉटन में मिट्टी के बैक्टीरिया 'बैसिलस थुरिंगिएंसिस' से लिए गए जीन होते हैं, जो कुछ खास तरह के बॉलवर्म कीटों के लिए ज़हरीले प्रोटीन बनाते हैं। Bt कॉटन को भारत में 2002 में कमर्शियल खेती के लिए मंज़ूरी मिली थी और यह देश में कमर्शियल खेती के लिए मंज़ूर एकमात्र GM फसल है। HTBt कॉटन असल में Bt कॉटन में एक और खूबी जोड़ता है - हर्बिसाइड टॉलरेंस (यानी हर्बिसाइड सहने की क्षमता)। कृषि मंत्रालय के अनुसार, मुख्य जीन 'cp4-epsps' कॉटन के पौधे को ग्लाइफोसेट के प्रति टॉलरेंट बनाता है। इसका मतलब है कि किसान खड़ी कॉटन की फसल पर ग्लाइफोसेट का छिड़काव कर सकते हैं, जिससे खरपतवार तो मर जाते हैं लेकिन कॉटन का पौधा बच जाता है। पारंपरिक कॉटन ऐसी प्रक्रिया को सहन नहीं कर सकता क्योंकि ग्लाइफोसेट फसल और खरपतवार के बीच कोई अंतर नहीं करता है।
इस पर प्रतिबंध क्यों है?
HTBt कॉटन को भारत में कमर्शियल खेती के लिए मंज़ूरी नहीं दी गई है; बल्कि एक वैज्ञानिक निष्कर्ष ने इस टेक्नोलॉजी को मूल रूप से असुरक्षित घोषित किया है।
भारत के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत, GM फसलों को पर्यावरण में लाने के लिए 'जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी' (GEAC) से मंज़ूरी लेनी होती है। यह मंज़ूरी 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम' के फ्रेमवर्क और जेनेटिकली इंजीनियर जीवों से जुड़े 1989 के नियमों के तहत ली जाती है। Bt कॉटन एकमात्र GM फसल है जिसे कमर्शियल खेती के लिए मंज़ूरी मिली है। नतीजतन, बिना मंज़ूरी वाली GM कॉटन की खेती, उत्पादन या बिक्री अनधिकृत है। कमर्शियल मंज़ूरी न होने के बावजूद, कई सालों से भारतीय खेतों में HTBt कॉटन पाया जा रहा है। 2018 में, सरकार ने महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में गैर-कानूनी खेती की खबरों की जांच के लिए एक 'फील्ड इंस्पेक्शन एंड साइंटिफिक इवैल्यूएशन कमेटी' (फील्ड निरीक्षण और वैज्ञानिक मूल्यांकन समिति) बनाई।
रेगुलेटरी चिंताएं सिर्फ़ इस बात तक सीमित नहीं हैं कि पौधा ग्लाइफोसेट के असर से बच पाता है या नहीं।
अधिकारियों ने कई मुद्दों पर डेटा मांगा है, जैसे कि हर्बिसाइड (खरपतवार नाशक) का इस्तेमाल, उसके अवशेष, मिट्टी पर असर, गैर-लक्षित जीव (non-target organisms), बायोसेफ्टी और इस टेक्नोलॉजी के सामाजिक-आर्थिक नतीजे। मौजूदा GEAC प्रक्रिया में मिट्टी के माइक्रोफ्लोरा और मिट्टी-माइक्रोब इंटरैक्शन, फीडिंग स्टडीज़ और खास इवेंट-स्पेसिफिक डिटेक्शन प्रोटोकॉल पर भी अतिरिक्त डेटा मांगा गया है। यह चिंता भी है कि किसी एक हर्बिसाइड पर बहुत ज़्यादा निर्भरता से ग्लाइफोसेट-रेसिस्टेंट खरपतवार (weed) पनप सकते हैं, जबकि हर्बिसाइड का बहुत ज़्यादा या गलत तरीके से इस्तेमाल 'ड्रिफ्ट' (हवा के साथ दवा का उड़ना) और 'ऑफ-टारगेट डैमेज' (गलत जगह नुकसान) जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) ने हर्बिसाइड रेजिस्टेंस (हर्बिसाइड के प्रति प्रतिरोधक क्षमता) की बड़ी चुनौती और इंटीग्रेटेड वीड मैनेजमेंट (एकीकृत खरपतवार प्रबंधन) की ज़रूरत पर ध्यान दिलाया है।
पाबंदी के बावजूद किसान इसका इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?
कई कपास किसानों के लिए, HTBt टेक्नोलॉजी मुख्य रूप से खरपतवार प्रबंधन की टेक्नोलॉजी है। मज़दूरों की कमी और हाथ से खरपतवार हटाने की बढ़ती लागत ने पारंपरिक खरपतवार नियंत्रण को बहुत महंगा बना दिया है।
FSII-NSAI समर्थित हालिया स्टडी का अनुमान है कि ग्लाइफोसेट के दो-तीन बार इस्तेमाल का खर्च लगभग 750-850 रुपये प्रति एकड़ आ सकता है, जबकि हाथ से खरपतवार हटाने का खर्च 12,000-15,000 रुपये होता है। इसमें यह भी पाया गया कि 2025-26 में ग्लाइफोसेट का आयात 29 प्रतिशत बढ़ा, जबकि 2022-23 और 2025-26 के बीच कानूनी Bt कपास बीज पैकेट की बिक्री में भारी गिरावट आई। इसलिए, किसानों के लिए आकर्षण का कारण ज़रूरी नहीं कि GM लेबल हो, बल्कि मज़दूरों पर निर्भरता कम करने और सस्ते में खरपतवार को नियंत्रित करने की संभावना है। इससे एक विरोधाभास पैदा हुआ है: एक ऐसी टेक्नोलॉजी जो औपचारिक रेगुलेटरी सिस्टम से बाहर है, उसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है क्योंकि यह कपास की खेती में एक बहुत ही वास्तविक समस्या का समाधान करती है।
मौजूदा स्थिति के क्या जोखिम हैं?
अनधिकृत HTBt कपास के विस्तार ने बीजों का एक 'ग्रे मार्केट' (अनौपचारिक बाज़ार) बना दिया है। क्योंकि ये बीज औपचारिक रेगुलेटरी और क्वालिटी-कंट्रोल सिस्टम से बाहर हैं, इसलिए इन्हें खरीदने वाले किसानों को जेनेटिक पहचान, बीज की क्वालिटी या परफॉर्मेंस के बारे में वैसी गारंटी नहीं मिलती, जैसी मंज़ूरी प्राप्त किस्मों के साथ मिलती है। ताज़ा स्टडी के अनुसार, 2025-26 में अनधिकृत HTBt बीज का बाज़ार 82-88 लाख पैकेट का होने का अनुमान है, जिसकी कीमत 1,000 रुपये प्रति पैकेट की औसत दर से 820-880 करोड़ रुपये हो सकती है।
आगे का रास्ता क्या है?
बहस अब तेज़ी से "बैन बनाम मंज़ूरी" से हटकर इस बात पर केंद्रित हो रही है कि "क्या और कैसे भारत को उस टेक्नोलॉजी को रेगुलेट करना चाहिए जिसका इस्तेमाल पहले से ही हो रहा है।"
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