
चंडीगढ़। हरियाणा में बढ़ती चीनी की कीमतों और आपूर्ति संकट को लेकर अब एक नया पहलू सामने आया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या केवल जमाखोरी, निर्यात या चीनी मिलों में स्टॉक रुकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी एक बड़ी वजह खेतों में भी दिखाई दे रही है।
राज्य के गन्ना किसानों के लिए कभी वरदान साबित हुई सीओ-0238 गन्ना किस्म अब रेड राट (लाल सड़न) बीमारी की चपेट में आ रही है। इस बीमारी ने गन्ना उत्पादन और चीनी रिकवरी को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जिससे आने वाले समय में चीनी उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
सीओ-0238 ने बदली थी गन्ने की तस्वीर
सीओ-0238 किस्म को उत्तर भारत में गन्ने की खेती में एक बड़ी क्रांति के रूप में देखा गया था।
इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) के अनुसार, वर्ष 2009 में जारी इस किस्म ने परीक्षणों में लगभग 81 टन प्रति हेक्टेयर तक गन्ना उत्पादन दिया था।
यह किस्म उस समय की लोकप्रिय सीओजे-64 किस्म की तुलना में काफी बेहतर साबित हुई थी।
आंकड़ों के मुताबिक, सीओ-0238 में सीओजे-64 के मुकाबले गन्ना उत्पादन करीब 19.96 प्रतिशत अधिक और चीनी रिकवरी लगभग 15.83 प्रतिशत ज्यादा दर्ज की गई थी।
किसानों ने तेजी से अपनाई किस्म
बेहतर उत्पादन और अधिक चीनी रिकवरी के कारण हरियाणा समेत उत्तर भारत के किसानों ने सीओ-0238 किस्म को बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू कर दिया।
कम समय में यह किस्म किसानों की पहली पसंद बन गई। बड़ी संख्या में किसानों ने अपनी पारंपरिक किस्मों को छोड़कर इसी किस्म की खेती शुरू कर दी।
इससे राज्य में गन्ने का उत्पादन बढ़ा और चीनी मिलों को भी बेहतर रिकवरी मिलने लगी।
एक ही किस्म पर निर्भरता बनी कमजोरी
हालांकि, समय के साथ सीओ-0238 किस्म पर अत्यधिक निर्भरता अब किसानों के लिए चुनौती बन गई है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक ही किस्म की बड़े क्षेत्र में लगातार खेती करने से उसमें बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
रेड राट बीमारी ने इसी स्थिति का फायदा उठाया और धीरे-धीरे गन्ने के खेतों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया।
रेड राट बीमारी से उत्पादन पर असर
रेड राट गन्ने की गंभीर बीमारियों में से एक मानी जाती है। इसमें पौधे अंदर से कमजोर होने लगते हैं और गन्ने की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
बीमारी के कारण गन्ने का वजन कम हो सकता है और चीनी की रिकवरी पर भी असर पड़ता है।
यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका सीधा असर चीनी मिलों की उत्पादन क्षमता पर पड़ सकता है।
चीनी संकट से जुड़ा बड़ा कारण
देश और प्रदेश में चीनी की कीमतों को लेकर कई कारण सामने आते रहे हैं। इनमें स्टॉक प्रबंधन, बाजार की मांग, निर्यात नीति और आपूर्ति व्यवस्था शामिल हैं।
लेकिन हरियाणा में विशेषज्ञ अब खेतों की स्थिति को भी एक महत्वपूर्ण कारण मान रहे हैं।
यदि गन्ने का उत्पादन प्रभावित होता है तो आने वाले सीजन में चीनी उत्पादन कम हो सकता है, जिससे बाजार में दबाव बढ़ सकता है।
किसानों के सामने नई चुनौती
हरियाणा के गन्ना किसानों के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है।
एक ओर उन्हें बीमारी से प्रभावित फसल का नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बेहतर उत्पादन देने वाली वैकल्पिक किस्मों की तलाश भी करनी पड़ रही है।
किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे अलग-अलग किस्मों की खेती करें और केवल एक किस्म पर निर्भर न रहें।
वैज्ञानिकों ने दी विविधता अपनाने की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि गन्ने की खेती में किस्मों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
किसानों को ऐसी किस्मों को भी अपनाना चाहिए जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बीमारी प्रतिरोधी हों।
इसके अलावा खेतों की नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों को हटाना और वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल बीमारी को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
चीनी उद्योग पर भी पड़ सकता है असर
हरियाणा में चीनी मिलों की कार्यप्रणाली काफी हद तक गन्ने की उपलब्धता और गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
अगर रेड राट बीमारी के कारण गन्ने की पैदावार और रिकवरी प्रभावित होती है तो इसका असर मिलों के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में चीनी उद्योग और किसानों दोनों के लिए समय रहते कदम उठाना जरूरी हो गया है।
आगे की रणनीति पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा में चीनी संकट का स्थायी समाधान केवल बाजार प्रबंधन से नहीं बल्कि कृषि स्तर पर सुधार से भी जुड़ा हुआ है।
गन्ने की बेहतर किस्मों का चयन, बीमारी नियंत्रण और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर इस चुनौती से निपटा जा सकता है।
सीओ-0238 ने जहां कभी हरियाणा के गन्ना किसानों को नई ऊंचाई दी थी, वहीं अब रेड राट बीमारी ने इस किस्म के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है। आने वाला समय तय करेगा कि किसान और कृषि विभाग इस चुनौती से किस तरह निपटते हैं।





