
Goa गोवा : गोवा के बेलेम और वेलसाओ क्षेत्रों में रविवार को सैंकोले में प्रस्तावित बड़े रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स के खिलाफ किसानों और स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों का कहना है कि बिना नियंत्रित विकास के कारण पहले ही उनकी कृषि भूमि सीवेज के पानी से प्रभावित हो चुकी है और नए निर्माण से गांव के पर्यावरण और जीवनशैली पर गंभीर असर पड़ सकता है।
स्थानीय किसानों ने आरोप लगाया कि ऊंचे क्षेत्रों में बने बड़े आवासीय कॉम्प्लेक्स से निकलने वाला गंदा पानी निचले खेतों में जमा हो रहा है, जिससे खेती करना मुश्किल हो गया है। उनका कहना है कि लगातार सीवेज के संपर्क में रहने से न केवल फसलें प्रभावित हो रही हैं, बल्कि किसानों की सेहत पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
सोशल वर्कर और पाले टोलेम ज़ेटकरांचे एसोसिएशन के अध्यक्ष रोकेज़िन्हो डिसूज़ा ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्र के किसान लगातार बिगड़ती स्थिति से जूझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले मई महीने में खेतों में पानी भरने की समस्या नहीं होती थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
डिसूज़ा ने कहा कि बड़े निर्माण कार्यों के कारण अब खेत लगभग पूरे साल सीवेज के पानी से भरे रहते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खेतों में काम करने वाले किसानों में त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं और कई लोगों ने खेती करना तक छोड़ दिया है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रस्तावित नए प्रोजेक्ट्स ने पहले ही क्षेत्र की स्थिति बदलनी शुरू कर दी है। उनके अनुसार डेवलपर्स ने कई जगहों पर निर्माण क्षेत्र को नालीदार चादरों से घेर दिया है, जिससे पारंपरिक रास्ते बंद हो गए हैं। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के होली क्रॉस तक जाने पर भी रोक लगाए जाने की बात कही गई है, जहां ग्रामीण प्रार्थना करते हैं।
डिसूज़ा ने इसे केवल विकास नहीं बल्कि स्थानीय जीवन और संस्कृति पर सीधा असर बताया। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ विकास नहीं है, यह हमारी जीवन शैली पर हमला है।”
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस मुद्दे को तत्कालीन विधायक एंटोन वाज़ के सामने उठाया गया था, जिसके बाद प्रोजेक्ट को सैंकोले पंचायत से मंजूरी नहीं मिली थी। हालांकि, वर्तमान में पंचायत में निर्वाचित निकाय नहीं होने के कारण उन्हें डर है कि प्रशासनिक स्तर पर परियोजना को अनुमति मिल सकती है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पर्यावरण और कृषि भूमि की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए और बिना उचित जांच के किसी भी बड़े निर्माण प्रोजेक्ट को मंजूरी न दी जाए।
कुल मिलाकर, यह मामला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की गंभीर बहस को सामने लाता है, जिसमें स्थानीय समुदाय अपने अस्तित्व और आजीविका की सुरक्षा के लिए आवाज उठा रहा है।





