
रायपुर। जनता से रिश्ता के एक पाठक ने अपनी व्यथा भेजी है, जिसका नाम गली कथा दिया है। टिकरापारा की इस गली की विशेषताएं लिखने बैठूं तो शायद राजधानी वासी विश्वास नहीं करेंगे कि कोई यहां कैसे रह सकता है, लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग रहते हैं। गली किसी चुनाव में वार्ड 61 की हो जाती है किसी चुनाव में वार्ड 62 की, गली वासी तय नहीं कर पाते कि 62 नंबर वार्ड पार्षद के हाथ जोड़ना है या वार्ड 61 के। इसी गफलत के कारण दोनों वार्ड के सफाई कर्मी कन्फ्यूज हो जाते हैं कि यहां झाड़ू लगाना है या नहीं, तो चार छः दस दिन झाड़ू नहीं लगती, उसी अनुपात में दस बीस दिन नालियां साफ नहीं होती, जबकि 15 से 18 गौवंश लगातार यहां बैठे रहते हैं और भगाने पर गुस्से में गोबर और मूत्र विसर्जन कर जाते हैं।
आप कल्पना करें सौ मीटर की गली जिसमें कई कई दिन झाड़ू नहीं लगती 15 से 20 गौवंश लगातार मल मूत्र विसर्जन करते हैं का क्या हाल होगा, और अभी गली में हरदीहा साहू समाज के सामुदायिक भवन का पिछला दरवाजा भी खुलता है, पिछला दरवाजा होने के कारण भवन में होने वाले कार्यक्रमों के आयोजक बची हुई खाद्य सामग्री और प्रतिबंधित डिस्पोजल सीधे नाली में बहाते हैं, खाद्य सामग्री दो तीन दिन बाद सड़ांध पैदा करती है और डिस्पोजल नाली जाम करते हैं। गली कथा अभी खत्म नहीं हुई, भवन में आए दिन होने वाले कार्यक्रमों के आयोजक लगातार डीजे की आनंददायक स्वर लहरियों से गली वासियों का मुफ्त मनोरंजन करते हैं, और मनोरंजन के मामले में ये सुप्रीम कोर्ट के रात्रि दस बजे बंद करने के आदेश की भी परवाह नहीं करते। एग्जाम के टाइम में हमारी गली के बच्चे अपने दोस्तों के यहां पढ़ने चले जाते हैं, जिससे बच्चों में टीम भावना विकसित होती है जिसका श्रेय भी भवन में बजते कानफोडू डीजे को जाता है। और हां अधिकांश आयोजन खुशी के होते हैं और खुशी बिना चीयर्स किए कैसे व्यक्त की जा सकती है तो भवन की खुली छत पर जाम छलकाए जाते है बाद में वो ही जाम रूपी डिस्पोजल हमारे घरों में उड़ते हुए आते हैं, और हम हसरत भरी नजरों से उन डिस्पोजल को निहारते हैं । गली को कोई सुविधा नहीं ऐसा भी नहीं है कुछ चीजें तो हमें बाकियों से डबल मिलतीं हैं मिसाल के लिए खंभे में लाइट चौबीस घंटे जलती है, यह बात अलग है दो तीन महीने में फ्यूज होने पर दोबारा जलने में फिर दो तीन महीने लगते हैं तो हिसाब बराबर हो जाता है। ऐसा भी नहीं कि वार्ड पार्षद इस गली में नहीं आते, बिल्कुल आते हैं, दो दो वार्ड के पार्षद हाथ जोड़ते हुए आते हैं, निगम चुनाव में आते हैं, विधान सभा चुनाव में आते हैं, लोकसभा चुनाव में आते हैं, आसपास पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को आते हैं, अब इससे ज्यादा के लिए तो पुराने लोग कह गए हैं एक ही जगह बार बार जाने से सम्मान में कमी आती है, तो वे एकदम ठीक करते हैं।





